प्रेम से पुलकित ब्रह्मा स्तुति करते हैं। हे हरि, सदा सुख के धाम; आपके यश ने रावण को ऐसे पकड़ा जैसे गरुड़ बड़े सर्प को। आप ज्ञानमय, अजन्मा, व्यापक, एक और अनादि हैं। आपने दीन विभीषण को राजा बनाया। वेद कहते हैं, यह कोई कही-सुनी बात नहीं, कि आप सब रूप हैं फिर भी कोई रूप नहीं बनते, जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य से भिन्न भी है और अभिन्न भी। ये वानर कृतार्थ हैं, जो आदर से आपका मुख देखते हैं; धिक्कार है उस देव-शरीर को जो आपकी भक्ति भूलकर संसार में भटके। मेरी भेद करने वाली बुद्धि हर लीजिए। अपने चरण-कमलों में सदा प्रेम का वर दीजिए। शोभा के सागर को देखते हुए ब्रह्मा के नेत्र तृप्त नहीं होते।
सर चाप मनोहर त्रोन धरं । जरजारुन-लोचन भूपबरं । सुख-मन्दिर सुन्दर श्रीरमनं । मद मार मुधा-ममता-समनं ॥ अनवद्य अखंड न गोचर गो । सब रूप सदा सब होइ न गो । इति बेद बदन्ति न दन्तकथा । रवि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥
sara cāpa manohara trona dharaṃ | jarajāruna-locana bhūpabaraṃ | sukha-mandira sundara śrīramanaṃ | mada māra mudhā-mamatā-samanaṃ || anavadya akhaṃḍa na gocara go | saba rūpa sadā saba hoi na go | iti beda badanti na dantakathā | ravi ātapa bhinnamabhinna jathā ||
कृतकृत्य बिभो सब बानर ये । निरखंति तवानन सादर जे । धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥ अब दीन दयाल दया करिऐ । मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ । जेहि तैं बिपरीत क्रिया करिऐ । दुख से सुख मानि सुखी चरिऐ ॥
kṛtakṛtya bibho saba bānara ye | nirakhaṃti tavānana sādara je | dhiga jīvana deva sarīra hare | tava bhakti binā bhava bhūli pare || aba dīna dayāla dayā kariai | mati mori bibhedakarī hariai | jehi taiṃ biparīta kriyā kariai | dukha se sukha māni sukhī cariai ||