लंकाकाण्ड

अध्याय 108: सीता का प्रभु के सामने लाया जाना

8 श्लोक · 108 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

सीता का प्रभु के सामने लाया जाना

सीता हनुमान से कहती हैं कि ऐसा यत्न करो कि मैं शीघ्र प्रभु के दर्शन करूँ। समाचार सुनकर प्रभु अंगद और विभीषण को हनुमान के साथ भेजते हैं कि जनकसुता को आदर से ले आएँ। निशाचरियाँ उन्हें स्नान कराकर वस्त्र-आभूषण पहनाती हैं और पालकी लाती हैं; प्रभु का स्मरण करती हुई सीता उस पर बैठती हैं। भालू-वानर देखने आते हैं तो रक्षक उन्हें हटाते हैं। रघुवीर कहते हैं: सखा, सीता को पैदल लाओ, वानर उन्हें माता की तरह देखें। वानर हर्षित होते हैं और देवता फूल बरसाते हैं। अन्तर्यामी प्रभु ने असली सीता को पहले अग्नि में रखा था, अब उन्हें प्रकट करना चाहते थे। इसी कारण करुणानिधि कुछ कठोर वचन कहते हैं, जिन्हें सुनकर राक्षसियाँ दुखी होने लगती हैं।

108.1

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता । देखउँ नयन स्याम मृदु गाता ॥
तब हनुमान राम पहिँ जाई । जनक-सुता के कुसल सुनाई ॥

aba soi jatana karahu tumha tātā | dekhaum̐ nayana syāma mṛdu gātā ||
taba hanumāna rāma pahim̐ jāī | janaka-sutā ke kusala sunāī ||

108.2

सुनि सन्देस भानुकुलभूषन । बोलि लिये जुबराज बिभीषन ॥
मारुतसुत के सङ्ग सिधावहु । सादर जनक-सुतहि लेइ आवहु ॥

suni sandesa bhānukulabhūṣana | boli liye jubarāja bibhīṣana ||
mārutasuta ke saṅga sidhāvahu | sādara janaka-sutahi lei āvahu ||

108.3

तुरतहिं सकल गये जहँ सीता । सेवहिँ सब निसिचरीं बिनीता ॥
बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो । सोदर तिन्ह सीतहिं अन्हवावा ॥

turatahiṃ sakala gaye jaham̐ sītā | sevahim̐ saba nisicarīṃ binītā ||
begi bibhīṣana tinhahi sikhāyo | sodara tinha sītahiṃ anhavāvā ||

108.4

बहु प्रकार भूषन पहिरायें । सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए ॥
ता पर हरषि चढ़ी बैदेही । सुमिरि राम-सुख धाम सनेही ॥

bahu prakāra bhūṣana pahirāyeṃ | sibikā rucira sāji puni lyāe ||
tā para haraṣi car̤hī baidehī | sumiri rāma-sukha dhāma sanehī ||

108.5

बेतपानि-रच्छक चहुँ पासा । चले सकल मन परम-हुलासा ॥
देखन भालु कीस सब आये । रच्छक कोपि निवारन धाए ॥

betapāni-racchaka cahum̐ pāsā | cale sakala mana parama-hulāsā ||
dekhana bhālu kīsa saba āye | racchaka kopi nivārana dhāe ||

108.6

कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु ॥
देखहि कपि जननी की नाँई । बिहँसि कहा रघुनाथ गोसाँई ॥

kaha raghubīra kahā mama mānahu | sītahi sakhā payādeṃ ānahu ||
dekhahi kapi jananī kī nām̐ī | biham̐si kahā raghunātha gosām̐ī ||

108.7

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे । नभ तें सुरन्ह सुमन बहु बरषे ॥
सीता प्रथम अनल मह राखी । प्रगट कीन्ह चह अन्तर-साखी ॥

suni prabhu bacana bhālu kapi haraṣe | nabha teṃ suranha sumana bahu baraṣe ||
sītā prathama anala maha rākhī | pragaṭa kīnha caha antara-sākhī ||

दो॰ 108दोहा

तेहि कारन करुना निधि, कहे कछुक दुर्बाद ।
सुनत जातुधानीं सब लागीँ करन बिषाद ॥

tehi kārana karunā nidhi, kahe kachuka durbāda |
sunata jātudhānīṃ saba lāgīm̐ karana biṣāda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0