लंकाकाण्ड

अध्याय 109: सीता का अग्नि-प्रवेश और प्रकट होना

8 श्लोक · 109 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

सीता का अग्नि-प्रवेश और प्रकट होना

प्रभु के वचन मानकर सीता कहती हैं: लक्ष्मण, धर्म के नेगी बनो और तुरन्त अग्नि प्रकट करो। सजल नेत्र, मौन लक्ष्मण प्रभु का रुख देखकर अग्नि जलाते हैं। वैदेही के हृदय में हर्ष है, भय नहीं: यदि मेरे हृदय में रघुवीर को छोड़ दूसरी गति नहीं, तो अग्निदेव मेरे लिए चन्दन जैसे शीतल हों। प्रभु का स्मरण कर वे अग्नि में प्रवेश करती हैं। छाया-मूर्ति और लौकिक कलंक जल जाते हैं। अग्निदेव स्वयं सच्ची सीता का हाथ पकड़कर उन्हें प्रभु को सौंपते हैं, जैसे क्षीरसागर ने लक्ष्मी को विष्णु को सौंपा था। वे प्रभु के बाएँ ऐसे शोभित हैं जैसे नीले कमल के पास सोने के कमल की कली। देवता फूल बरसाते हैं, और जानकी सहित प्रभु को देखकर भालू वानर हर्षित होकर रघुपति की जय बोलते हैं।

109.1

प्रभु के बचन सीस धरि सीता । बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥
लछिमन होहु धरम के नेगी । पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥

prabhu ke bacana sīsa dhari sītā | bolī mana krama bacana punītā ||
lachimana hohu dharama ke negī | pāvaka pragaṭa karahu tumha begī ||

109.2

सुनि लछिमन सीता के बानी । बिरह-बिबेक धरम-निति सानी ॥
लोचन सजल जोरि कर दोऊ । प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥

suni lachimana sītā ke bānī | biraha-bibeka dharama-niti sānī ||
locana sajala jori kara doū | prabhu sana kachu kahi sakata na oū ||

109.3

देखि राम रुख लछिमन धाये । पावक प्रगटि काठ बहु लाये ॥
पावक प्रबल देखि बैदेही । हृदयँ हरष नहिँ भय कछु तेही ॥

dekhi rāma rukha lachimana dhāye | pāvaka pragaṭi kāṭha bahu lāye ||
pāvaka prabala dekhi baidehī | hṛdayam̐ haraṣa nahim̐ bhaya kachu tehī ||

109.4

जो मन बच क्रम मम उर माहीं । तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥
तौ कृसानु सब कै गति जाना । मे कहँ होहु श्रीखंड समाना ॥

jo mana baca krama mama ura māhīṃ | taji raghubīra āna gati nāhīṃ ||
tau kṛsānu saba kai gati jānā | me kaham̐ hohu śrīkhaṃḍa samānā ||

109.छं॰ 1छन्द

श्रीखंड-सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली ।
जय कोसलेस महेस बन्दित, चरन रति अति-निर्मली ॥
प्रतिबिम्ब अरु लौकिक कलङ्क प्रचंड पावक महँ जरे ।
प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर नभ, सिद्ध मुनि देखहिं खरे ॥

śrīkhaṃḍa-sama pāvaka prabesa kiyo sumiri prabhu maithilī |
jaya kosalesa mahesa bandita, carana rati ati-nirmalī ||
pratibimba aru laukika kalaṅka pracaṃḍa pāvaka maham̐ jare |
prabhu carita kāhum̐ na lakhe nabha sura nabha, siddha muni dekhahiṃ khare ||

109.छं॰ 2छन्द

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य स्रुति जग विदित जो ।
जिमि छीरसागर इन्दिरा रामहिँ समर्पी आनि से ॥
सो राम बाम-बिभाग राजति, रुचिर अति सोभा भली ।
नव-नील नीरज निकट मानहुँ, कनक-पङ्कज की कली ॥

dhari rūpa pāvaka pāni gahi śrī satya sruti jaga vidita jo |
jimi chīrasāgara indirā rāmahim̐ samarpī āni se ||
so rāma bāma-bibhāga rājati, rucira ati sobhā bhalī |
nava-nīla nīraja nikaṭa mānahum̐, kanaka-paṅkaja kī kalī ||

दो॰ 109 (क)दोहा

बरषहिँ सुमन हरषि सुर, बाजहिं गगन निसान ।
गावहिँ किंनर सुरबधू, नाचहिँ चढ़ीं बिमान ॥

baraṣahim̐ sumana haraṣi sura, bājahiṃ gagana nisāna |
gāvahim̐ kiṃnara surabadhū, nācahim̐ car̤hīṃ bimāna ||

दो॰ 109 (ख)दोहा

जनक-सुता समेत प्रभु, सोभा अमित अपार ।
देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार ॥

janaka-sutā sameta prabhu, sobhā amita apāra |
dekhi bhālu kapi haraṣe jaya raghupati sukha sāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0