लंकाकाण्ड

अध्याय 103: रावण का अन्त, उसका तेज प्रभु में लीन

9 श्लोक · 103 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण का अन्त, उसका तेज प्रभु में लीन

एक बाण नाभि का अमृत सोख लेता है, बाकी सिर और भुजाएँ लेकर चले जाते हैं। बिना सिर का धड़ धरती पर नाचता और दौड़ता है, तो प्रभु उसके दो टुकड़े कर देते हैं। मरते समय रावण गरजता है: कहाँ है राम? उसके गिरने से धरती डोलती है और दोनों टुकड़े भालू-वानरों को दबा देते हैं। बाण सिर-भुजाएँ मन्दोदरी के आगे रखकर तरकश में लौट आते हैं। उसका तेज प्रभु के मुख में समा जाता है; शम्भु और ब्रह्मा हर्षित होते हैं। ब्रह्माण्ड जय-जयकार से भर जाता है, देवता फूल बरसाते हैं: जय कृपालु, जय मुकुन्द। फूलों से गुँथी जटा और शरीर पर रक्त-कणों से प्रभु रणभूमि में शोभित हैं। वे कृपा-दृष्टि से देवताओं को अभय करते हैं।

103.1

लायक एक नाभि सर सोखा । अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥
लै सिर बाहु चले नाराचा । सिर-भुज हीन रुंड महि नाचा ॥

lāyaka eka nābhi sara sokhā | apara lage bhuja sira kari roṣā ||
lai sira bāhu cale nārācā | sira-bhuja hīna ruṃḍa mahi nācā ||

103.2

धरनि धसइ पर धाव प्रचंडा । तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी । कहाँ राम रन भयउँ पचारी ॥

dharani dhasai para dhāva pracaṃḍā | taba sara hati prabhu kṛta dui khaṃḍā ||
garjeu marata ghora rava bhārī | kahām̐ rāma rana bhayaum̐ pacārī ||

103.3

डोली भूमि गिरत दसकन्धर । छुभित सिन्धु सरि दिग्गज भूधर ॥
धरनि परेउ दोउ खंड बढ़ाई । चापि भालु मर्कट समुदाई ॥

ḍolī bhūmi girata dasakandhara | chubhita sindhu sari diggaja bhūdhara ||
dharani pareu dou khaṃḍa bar̤hāī | cāpi bhālu markaṭa samudāī ||

103.4

मन्दोदरि आगें भुज सीसा । धरि सर चले जहाँ जगदीसा ॥
प्रविसे सब निषङ्ग महँ जाई । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥

mandodari āgeṃ bhuja sīsā | dhari sara cale jahām̐ jagadīsā ||
pravise saba niṣaṅga maham̐ jāī | dekhi suranha duṃdubhīṃ bajāī ||

103.5

तासु तेज समान प्रभु आनन । हरषे देखि सम्भु चतुरानन ॥
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा । जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा ॥

tāsu teja samāna prabhu ānana | haraṣe dekhi sambhu caturānana ||
jaya jaya dhuni pūrī brahmaṃḍā | jaya raghubīra prabala bhujadaṃḍā ||

103.6

बरषहिँ सुमन देव-सुनि-बृन्दा । जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥

baraṣahim̐ sumana deva-suni-bṛndā | jaya kṛpāla jaya jayati mukuṃdā ||

103.छं॰ 1छन्द

जय कृपा कन्द मुकंद द्वन्द-हरन सरन-सुख-प्रद प्रभो ।
खल-दल-बिदारन परम कारन, कारुनीक सदा विभो ॥
सुर सुमन परहिं हरष सङ्कुल, बाज दुन्दुभि गहगही ।
सङ्ग्राम-अङ्गन राम अङ्ग अनङ्ग बहु सोभा लही ॥

jaya kṛpā kanda mukaṃda dvanda-harana sarana-sukha-prada prabho |
khala-dala-bidārana parama kārana, kārunīka sadā vibho ||
sura sumana parahiṃ haraṣa saṅkula, bāja dundubhi gahagahī |
saṅgrāma-aṅgana rāma aṅga anaṅga bahu sobhā lahī ||

103.छं॰ 2छन्द

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच, अति मनोहर राजहीं ।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल, समेत उडुगन भ्राजहीं ॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत, रुधिर कन तन अति बने ।
जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने ॥

sira jaṭā mukuṭa prasūna bica bica, ati manohara rājahīṃ |
janu nīlagiri para tar̤ita paṭala, sameta uḍugana bhrājahīṃ ||
bhujadaṃḍa sara kodaṃḍa pherata, rudhira kana tana ati bane |
janu rāyamunīṃ tamāla para baiṭhīṃ bipula sukha āpane ||

दो॰ 103दोहा

कृपा दृष्टि करि प्रभु, अभय किए सुर बृन्द ।
भालु कीस सब हरषे, जय सुख धाम मुकंद ॥

kṛpā dṛṣṭi kari prabhu, abhaya kie sura bṛnda |
bhālu kīsa saba haraṣe, jaya sukha dhāma mukaṃda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0