लंकाकाण्ड

अध्याय 104: मन्दोदरी का विलाप और श्रीराम की महिमा

9 श्लोक · 104 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

मन्दोदरी का विलाप और श्रीराम की महिमा

पति के सिर देखते ही मन्दोदरी मूर्च्छित हो जाती है। स्त्रियाँ उसे उठाकर रोती हुई रावण के पास आती हैं, बाल खुले, छाती पीटती हुई। मन्दोदरी कहती है: नाथ, तुम्हारे बल से धरती डोलती थी, अग्नि और सूर्य तेजहीन हो जाते थे; वही शरीर आज धूल में पड़ा है। वरुण, कुबेर, इन्द्र और वायु कोई तुम्हारे सामने नहीं टिका; तुमने काल और यम को जीता, और आज अनाथ की तरह पड़े हो। राम से विमुख होने से कुल में रोने वाला भी न बचा; सियार तुम्हारे सिर खाते हैं, राम-विमुख के लिए यह अनुचित नहीं। वह कहती है: वे स्वयं हरि हैं, जिन्हें शिव और ब्रह्मा नमन करते हैं। अहा, रघुनाथ जैसा कृपासिन्धु दूसरा नहीं; योगियों को दुर्लभ गति उन्होंने तुम्हें दे दी।

104.1

पति सिर देखत मन्दोदरी । मुरछित बिकल धरनि खसि परी ॥
जुबति बृन्द रोवत, उठि धाईँ । तेहि उठाइ रावन पहिँ आई ॥

pati sira dekhata mandodarī | murachita bikala dharani khasi parī ||
jubati bṛnda rovata, uṭhi dhāīm̐ | tehi uṭhāi rāvana pahim̐ āī ||

104.2

पति गति देखि ते करहिँ पुकारा । छूटे कच नहिँ बपुष तारा ॥
उर ताड़ना करहिँ बिधि नाना । रोवत करहिं प्रताप बखाना ॥

pati gati dekhi te karahim̐ pukārā | chūṭe kaca nahim̐ bapuṣa tārā ||
ura tār̤anā karahim̐ bidhi nānā | rovata karahiṃ pratāpa bakhānā ||

104.3

तब बल नाथ ढोल नित धरनी । तेज हीन पावक सखि तरनी ॥
सेष कमठ सहि सकहिं न भारा । सो तनु भूमि परेउ भरि छारा ॥

taba bala nātha ḍhola nita dharanī | teja hīna pāvaka sakhi taranī ||
seṣa kamaṭha sahi sakahiṃ na bhārā | so tanu bhūmi pareu bhari chārā ||

104.4

बरुन कुबेर सुरेस समीरा । रन सन्मुख पर काहु न धीरा ॥
भुजबल जितेहु काल जम साईं । आजु परेहु अनाथ की नाईं ॥

baruna kubera suresa samīrā | rana sanmukha para kāhu na dhīrā ||
bhujabala jitehu kāla jama sāīṃ | āju parehu anātha kī nāīṃ ||

104.5

जगत बिदित तुम्हारि प्रभुताई । सुत परिजन बल बरनि न जाई ॥
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥

jagata bidita tumhāri prabhutāī | suta parijana bala barani na jāī ||
rāma bimukha asa hāla tumhārā | rahā na kou kula rovanihārā ||

104.6

तब बस विधि प्रपञ्च सब नाथा । सभय दिसिप नित नावहिं माथा ॥
अब तव सिर भुज जम्बुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥

taba basa vidhi prapañca saba nāthā | sabhaya disipa nita nāvahiṃ māthā ||
aba tava sira bhuja jambuka khāhīṃ | rāma bimukha yaha anucita nāhīṃ ||

104.7

काल बिबस पति कहा न माना । अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥

kāla bibasa pati kahā na mānā | aga jaga nāthu manuja kari jānā ||

104.छं॰ 1छन्द

छं. जान्यो मनुज करि दनुज-कानन, दहन पावक हरि स्वयं ।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय, भजेहु नहिँ करुनामयं ॥
आजन्म त परद्रोह-रस पापौघमय तब तनु अर्थ ।
तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥

chaṃ. jānyo manuja kari danuja-kānana, dahana pāvaka hari svayaṃ |
jehi namata siva brahmādi sura piya, bhajehu nahim̐ karunāmayaṃ ||
ājanma ta paradroha-rasa pāpaughamaya taba tanu artha |
tumhahū diyo nija dhāma rāma namāmi brahma nirāmayaṃ ||

दो॰ 104दोहा

अहह नाथ रघुनाथ सम, कृपासिन्धु नहिँ आन ।
जोगि बृन्द दुर्लभ गति, तोहि दीन्हि भगवान ॥

ahaha nātha raghunātha sama, kṛpāsindhu nahim̐ āna |
jogi bṛnda durlabha gati, tohi dīnhi bhagavāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0