लंकाकाण्ड

अध्याय 101: रावण की अन्तिम माया का नाश

8 श्लोक · 101 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण की अन्तिम माया का नाश

रावण के कपट से धनुष लिए बेताल, भूत, पिशाच और हाथ में खोपड़ी लिए योगिनियाँ प्रकट होती हैं, जो रक्त पीकर नाचती हैं। चारों ओर पकड़ो, मारो की धुनि भर जाती है। वानर जहाँ भागते हैं वहाँ आग दिखती है, फिर धूल बरसती है। रावण फिर गरजता है, और लक्ष्मण, सुग्रीव समेत सब वीर हा राम कहते हुए अचेत हो जाते हैं। फिर वह बहुत-से नकली हनुमान बनाता है, जो पूँछ उठाकर प्रभु को घेर लेते हैं; बीच में श्याम प्रभु इन्द्रधनुषों से घिरे तमाल जैसे शोभित हैं। रघुवीर एक बाण से माया हर लेते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि शारदा और वेद कल्पों तक गाएँ, तो भी इस युद्ध का पार न पाएँ। सिर-भुजाएँ बार-बार कटती हैं, पर रावण नहीं मरता।

101.छं॰ 1छन्द

जब कीन्ह तेहिं पाखंड । भए प्रगट जन्तु प्रचंड ।
बेताल भूत पिसाच । कर धरें धनु नाराच ॥
जोगिनि गहें करबाल । एक हाथ मनुज-कपाल ।
करि सद्य सोनित पान । नाचहिँ कहिँ बहु गान ॥

jaba kīnha tehiṃ pākhaṃḍa | bhae pragaṭa jantu pracaṃḍa |
betāla bhūta pisāca | kara dhareṃ dhanu nārāca ||
jogini gaheṃ karabāla | eka hātha manuja-kapāla |
kari sadya sonita pāna | nācahim̐ kahim̐ bahu gāna ||

101.छं॰ 2छन्द

धरु मारू बोलहिँ घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ और ।
मुख बाइ धावहिँ खान । तब लगे कीस परान ॥
जहँ जाहिँ मर्कट भागि । तहँ धरत देखहिँ आगि ।
भये बिकल बानर भालु । पुनि लाग बरषै बालु ॥

dharu mārū bolahim̐ ghora | rahi pūri dhuni cahum̐ aura |
mukha bāi dhāvahim̐ khāna | taba lage kīsa parāna ||
jaham̐ jāhim̐ markaṭa bhāgi | taham̐ dharata dekhahim̐ āgi |
bhaye bikala bānara bhālu | puni lāga baraṣai bālu ||

101.छं॰ 3छन्द

जहँ तहँ थकित करि कीस । गर्जेउ बहुरि दससीस ।
लछिमन कपीस समेत । भये सकल बीर अचेत ॥
हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिँ हाथ ।
एहि बिधि सकल बल तोरि । तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥

jaham̐ taham̐ thakita kari kīsa | garjeu bahuri dasasīsa |
lachimana kapīsa sameta | bhaye sakala bīra aceta ||
hā rāma hā raghunātha | kahi subhaṭa mījahim̐ hātha |
ehi bidhi sakala bala tori | tehiṃ kīnha kapaṭa bahori ||

101.छं॰ 4छन्द

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाये गये पाषाण ।
तिन्ह राम घेरे जाइ । चहुँ दिसि बरूथ बनाइ ॥
मारहु धरहु जनि जाइ । कटकटहिँ पूँछ उठाइ ।
दहँ-दिसि लंगूर बिराज । तेहिं मध्य कोसल राज ॥

pragaṭesi bipula hanumāna | dhāye gaye pāṣāṇa |
tinha rāma ghere jāi | cahum̐ disi barūtha banāi ||
mārahu dharahu jani jāi | kaṭakaṭahim̐ pūm̐cha uṭhāi |
daham̐-disi laṃgūra birāja | tehiṃ madhya kosala rāja ||

101.छं॰ 5छन्द

तेहिं मध्य कोसलराज सुन्दर, स्याम तनु सोभा लही ।
जनु इन्द्रधनुष अनेक की बर, बारि तुङ्ग तमालही ॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर, बढ़त जय जय जय करी ।
रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महँ माया हरी ॥

tehiṃ madhya kosalarāja sundara, syāma tanu sobhā lahī |
janu indradhanuṣa aneka kī bara, bāri tuṅga tamālahī ||
prabhu dekhi haraṣa biṣāda ura sura, bar̤hata jaya jaya jaya karī |
raghubīra ekahi tīra kopi nimeṣa maham̐ māyā harī ||

101.छं॰ 6छन्द

माया बिगत कपि भालु हरषे, बिटप गिरि गहि सब फिरे ।
सर निकर छाड़े राम रावन, बाहु-सिर पुनि महि गिरे ॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीँ ।
सत सेन सारद निगम कबि तेउ, तदपि पार न पावहीं ॥

māyā bigata kapi bhālu haraṣe, biṭapa giri gahi saba phire |
sara nikara chār̤e rāma rāvana, bāhu-sira puni mahi gire ||
śrīrāma rāvana samara carita aneka kalpa jo gāvahīm̐ |
sata sena sārada nigama kabi teu, tadapi pāra na pāvahīṃ ||

दो॰ 101 (क)दोहा

ताके गुन गन कछु कहे, जड़-मति तुलसीदास ।
जिमि निज-बल अनुसार जिमि, माछी उड़इ अकास ॥

tāke guna gana kachu kahe, jar̤a-mati tulasīdāsa |
jimi nija-bala anusāra jimi, māchī ur̤ai akāsa ||

दो॰ 101 (ख)दोहा

काटे सिर भुज बार बहु, भरत न भट लंकेस ।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि, व्याकुल देखि कलेस ॥

kāṭe sira bhuja bāra bahu, bharata na bhaṭa laṃkesa |
prabhu krīr̤ata sura siddha muni, vyākula dekhi kalesa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0