लंकाकाण्ड

अध्याय 100: सीता की लम्बी रात, भोर में रावण का लौटना

8 श्लोक · 100 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

सीता की लम्बी रात, भोर में रावण का लौटना

त्रिजटा तरह-तरह से समझाकर अपने घर चली जाती है। श्रीराम का स्वभाव स्मरण करके वैदेही को विरह की भारी पीड़ा होती है। वे रात और चन्द्रमा को बहुत कोसती हैं; रात युग जैसी लगती है, बीतती ही नहीं। जब विरह की जलन बहुत बढ़ती है, तब उनकी बाईं आँख और बाँह फड़कती हैं; शुभ शकुन मानकर वे धीरज धरती हैं कि अब कृपालु रघुवीर मिलेंगे। उधर आधी रात को रावण जागकर सारथी पर बिगड़ता है: मूर्ख, तूने मुझे रणभूमि से हटा दिया, धिक्कार है तुझे। सवेरे रावण रथ पर चढ़कर फिर दौड़ता है। वानर पर्वत और वृक्ष लेकर दौड़ते हैं। वे निशाचरों को भगाकर रावण को घेर लेते हैं और नखों से उसका शरीर फाड़ते हैं। उनका बल देखकर रावण अदृश्य होकर माया फैलाता है।

100.1

अस कहि बहुत भाँति समुझाई । पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥
राम सुभाउ सुमिरि बैदेही । उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥

asa kahi bahuta bhām̐ti samujhāī | puni trijaṭā nija bhavana sidhāī ||
rāma subhāu sumiri baidehī | upajī biraha bithā ati tehī ||

100.2

निसिहि ससिहि निन्दति बहु भाँती । जुग सम भई सिराति न राती ॥
करति बिलाप मनहिं मन भारी । राम-विरह जानकी दुखारी ॥

nisihi sasihi nindati bahu bhām̐tī | juga sama bhaī sirāti na rātī ||
karati bilāpa manahiṃ mana bhārī | rāma-viraha jānakī dukhārī ||

100.3

जब अति भयउ बिरह उर दाहू । फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥
सगुन बिचारि धरी सन धीरा । अब मिलिहहिँ कृपाल रघुबीरा ॥

jaba ati bhayau biraha ura dāhū | pharakeu bāma nayana aru bāhū ||
saguna bicāri dharī sana dhīrā | aba milihahim̐ kṛpāla raghubīrā ||

100.4

इहाँ अर्ध निसि रावन जागा । निज सारथि सन खीझन लागा ॥
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही । धिग धिग अधम मन्दमति तोही ॥

ihām̐ ardha nisi rāvana jāgā | nija sārathi sana khījhana lāgā ||
saṭha ranabhūmi char̤āisi mohī | dhiga dhiga adhama mandamati tohī ||

100.5

तेहिं पद-गहि बहु विधि समुझावा । भोर भये रथ चढ़ि पुनि धावा ॥
सुनि आगमन दसानन केरा । कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥

tehiṃ pada-gahi bahu vidhi samujhāvā | bhora bhaye ratha car̤hi puni dhāvā ||
suni āgamana dasānana kerā | kapi dala kharabhara bhayau ghanerā ||

100.6

जहँ तहँ भूधर-बिटप उपारी । धाए कटकटाइ भट भारी ॥

jaham̐ taham̐ bhūdhara-biṭapa upārī | dhāe kaṭakaṭāi bhaṭa bhārī ||

100.छं॰ 1छन्द

धाए जो मर्कट बिकट भालु, कराल कर भूधर धरा ।
अति-कोपि करहिं प्रहार मारत, भजि चले रजनीचरा ॥
बिचलाइ दल बलवन्त कीसन्ह, घेरि पुनि राबन लियो ।
चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो ॥

dhāe jo markaṭa bikaṭa bhālu, karāla kara bhūdhara dharā |
ati-kopi karahiṃ prahāra mārata, bhaji cale rajanīcarā ||
bicalāi dala balavanta kīsanha, gheri puni rābana liyo |
cahum̐ disi capeṭanhi māri nakhanhi bidāri tanu byākula kiyo ||

दो॰ 100दोहा

देखि महा मर्कट प्रबल, रावन कीन्ह विचार ।
अन्तरहित होइ निमिष मह, कृत माया विस्तार ॥

dekhi mahā markaṭa prabala, rāvana kīnha vicāra |
antarahita hoi nimiṣa maha, kṛta māyā vistāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0