लंकाकाण्ड

अध्याय 99: सीता का विलाप और त्रिजटा का रहस्य

9 श्लोक · 99 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

सीता का विलाप और त्रिजटा का रहस्य

उसी रात त्रिजटा सीता के पास जाकर सब कथा सुनाती है। शत्रु के सिर और भुजाएँ बढ़ने की बात सुनकर सीता बहुत डर जाती हैं। वे पूछती हैं: माता, जगत को दुख देने वाला यह कैसे मरेगा? प्रभु के बाणों से भी नहीं मरता। मेरा दुर्भाग्य उसे जिला रहा है। उसी विधाता ने कपट का सोने का हिरन बनाया और मुझसे लक्ष्मण को कटु वचन कहलवाए। त्रिजटा कहती है: राजकुमारी, हृदय में बाण लगने पर ही वह मरेगा। प्रभु उसके हृदय पर इसलिए नहीं मारते कि उसमें वैदेही बसती हैं, वैदेही के हृदय में राम, और राम के उदर में अनेक लोक हैं। त्रिजटा कहती है: सिर कटने से वह व्याकुल होगा, तुम्हारा ध्यान छूटेगा, तब प्रभु उसके हृदय में बाण मारेंगे।

99.1

तेही निसि सीता पहिँ जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥
सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी । सीता उर भइ त्रास घनेरी ॥

tehī nisi sītā pahim̐ jāī | trijaṭā kahi saba kathā sunāī ||
sira bhuja bār̤hi sunata ripu kerī | sītā ura bhai trāsa ghanerī ||

99.2

मुख मलीन उपजी सन चिन्ता । त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥
होइहि काह कहसि किन माता । केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥

mukha malīna upajī sana cintā | trijaṭā sana bolī taba sītā ||
hoihi kāha kahasi kina mātā | kehi bidhi marihi bisva dukhadātā ||

99.3

रघुपति-सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिं है हरि-पद-कमल बिछोही ॥

raghupati-sara sira kaṭehum̐ na maraī | bidhi biparīta carita saba karaī ||
mora abhāgya jiāvata ohī | jehiṃ hai hari-pada-kamala bichohī ||

99.4

जेहिं कृत कपट कनक-मृग-झूठा । अजहुँ से दैव मोहि पर रूठा ॥
जेहिं विधि मोहि दुख दुसह सहाये । लछिमन कहँ कटु-बचन कहाये ॥

jehiṃ kṛta kapaṭa kanaka-mṛga-jhūṭhā | ajahum̐ se daiva mohi para rūṭhā ||
jehiṃ vidhi mohi dukha dusaha sahāye | lachimana kaham̐ kaṭu-bacana kahāye ||

99.5

रघुपति बिरह सबिष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥
ऐसेहुं दुख जो राख मम माना । सोइ बिधि ताहि जिआव न आना ॥

raghupati biraha sabiṣa sara bhārī | taki taki māra bāra bahu mārī ||
aisehuṃ dukha jo rākha mama mānā | soi bidhi tāhi jiāva na ānā ||

99.6

बहु बिधि कर बिलाप जानकी । करि करि सुरति कृपानिधान की ॥
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी । उर सर लागत मरइ सुरारी ॥

bahu bidhi kara bilāpa jānakī | kari kari surati kṛpānidhāna kī ||
kaha trijaṭā sunu rājakumārī | ura sara lāgata marai surārī ||

99.7

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदयँ बसति वैदेही ॥

prabhu tāte ura hatai na tehī | ehi ke hṛdayam̐ basati vaidehī ||

99.छं॰ 1छन्द

एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी-डर सम बात है ।
मम उदर भुवन अनेक लागत, बान सब का नाम है ॥
सुनि बचन हरष बिषाद मन अति, देखि पुनि त्रिजटाँ कहा ।
अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुन्दरि तजहि संसय महा ॥

ehi ke hṛdayam̐ basa jānakī jānakī-ḍara sama bāta hai |
mama udara bhuvana aneka lāgata, bāna saba kā nāma hai ||
suni bacana haraṣa biṣāda mana ati, dekhi puni trijaṭām̐ kahā |
aba marihi ripu ehi bidhi sunahi sundari tajahi saṃsaya mahā ||

दो॰ 99दोहा

काटत सिर होइहि बिकल, छुटि जाइहि तब ध्यान ।
तब रावन कहँ हृदय मह, मरिहहिं राम-सुजान ॥

kāṭata sira hoihi bikala, chuṭi jāihi taba dhyāna |
taba rāvana kaham̐ hṛdaya maha, marihahiṃ rāma-sujāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0