अङ्गद कहइ जाउँ मैं पारा । जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥
जामवन्त कह तुम्ह सब लायक । पठइअ किमि सब ही कर नायक ॥
aṅgada kahai jāum̐ maiṃ pārā | jiyam̐ saṃsaya kachu phiratī bārā ||
jāmavanta kaha tumha saba lāyaka | paṭhaia kimi saba hī kara nāyaka ||
इति श्रीरामचरितमानसे सकल कलिकलुष विध्वंसने विशुद्ध सन्तोष सम्पादनो नाम चतुर्थः सोपानः समाप्तः ।
9 श्लोक · 30 में से 30
अंगद पार जाने को कहते हैं पर लौटने में संशय है, और जाम्बवान नायक को भेजना उचित नहीं मानते। फिर वे हनुमान से कहते हैं, हे बलवान, चुप क्यों हो? पवनपुत्र, तुम्हारा बल पवन के समान है, जगत में ऐसा कौन-सा काम है जो तुमसे न हो? राम-काज के लिए ही तुम्हारा अवतार है। सुनते ही हनुमान पर्वताकार हो जाते हैं, सोने-सा शरीर दमकता है। बार-बार सिंहनाद करके कहते हैं, खेल में सागर लाँघ जाऊँ, रावण को मारकर त्रिकूट उखाड़ लाऊँ; पर उचित सीख दो। जाम्बवान कहते हैं, इतना ही करो कि सीता को देखकर सुधि ले आओ; कमलनयन श्रीराम स्वयं राक्षसों को मारकर उन्हें लाएँगे। तुलसीदास चौथा सोपान पूरा करते हैं: रघुनाथ का यश भवरोग की औषध है, और सुनने वालों के मनोरथ शिवजी पूरे करते हैं।
अङ्गद कहइ जाउँ मैं पारा । जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥
जामवन्त कह तुम्ह सब लायक । पठइअ किमि सब ही कर नायक ॥
aṅgada kahai jāum̐ maiṃ pārā | jiyam̐ saṃsaya kachu phiratī bārā ||
jāmavanta kaha tumha saba lāyaka | paṭhaia kimi saba hī kara nāyaka ||
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥
पवन-तनय बल पवन समाना । बुधि-बिबेक-बिज्ञान-निधाना ॥
kahai rīchapati sunu hanumānā | kā cupa sādhi rahehu balavānā ||
pavana-tanaya bala pavana samānā | budhi-bibeka-bijñāna-nidhānā ||
कवन से काज कठिन जग माहीं । जो नहिँ होइ तात तुम्ह पाहीं ॥
राम-काज-लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ॥
kavana se kāja kaṭhina jaga māhīṃ | jo nahim̐ hoi tāta tumha pāhīṃ ||
rāma-kāja-lagi tava avatārā | sunatahiṃ bhayau parvatākārā ||
कनक-बरन-तन तेज बिराजा । मानहुँ अपर गिरिन्ह, कर राजा ॥
सिंहनाद करि बारहिँ-बारा । लीलहि नाषउँ जलधि खारा ॥
kanaka-barana-tana teja birājā | mānahum̐ apara girinha, kara rājā ||
siṃhanāda kari bārahim̐-bārā | līlahi nāṣaum̐ jaladhi khārā ||
सहित सहाय रावनहि मारी । आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ॥
जामवन्त मैं पूछउँ तोही । उचित सिखावन दीजहु मोही ॥
sahita sahāya rāvanahi mārī | ānaum̐ ihām̐ trikūṭa upārī ||
jāmavanta maiṃ pūchaum̐ tohī | ucita sikhāvana dījahu mohī ||
एतना करहु तात तुम्ह जाई । सीतहि देखि कहहु सुधि आई ॥
तब निज-भुज-बल राजिव नैना । कौतुक लागि सङ्ग कपि-सेना ॥
etanā karahu tāta tumha jāī | sītahi dekhi kahahu sudhi āī ||
taba nija-bhuja-bala rājiva nainā | kautuka lāgi saṅga kapi-senā ||
कपि सेन सङ्ग सँघारि निसिचर, राम सीतहि आनिहैं ।
त्रैलोक पावन सुजस सुर मुनि, नारदादि बखानिहैं ॥
जो सुनत गावत कहत समुझत, परम पद नर पावई ।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर, दास तुलसी गावई ॥
kapi sena saṅga sam̐ghāri nisicara, rāma sītahi ānihaiṃ |
trailoka pāvana sujasa sura muni, nāradādi bakhānihaiṃ ||
jo sunata gāvata kahata samujhata, parama pada nara pāvaī |
raghubīra pada pāthoja madhukara, dāsa tulasī gāvaī ||
भव-भेषज रघुनाथ-जस, सुनहिँ जे नर अरु नारि ।
तिन्ह कर सकल मनोरथ, सिद्ध करहिं त्रिसिरारि ॥
bhava-bheṣaja raghunātha-jasa, sunahim̐ je nara aru nāri |
tinha kara sakala manoratha, siddha karahiṃ trisirāri ||
नीलोत्पल-तन-स्याम, काम-कोटि-सोभा अधिक ।
सुनिय तासु गुन-ग्राम, जासु नाम अघ-खग-बधिक ॥
nīlotpala-tana-syāma, kāma-koṭi-sobhā adhika |
suniya tāsu guna-grāma, jāsu nāma agha-khaga-badhika ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0