किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 29: सौ योजन सागर कौन लाँघे?

5 श्लोक · 29 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

सौ योजन सागर कौन लाँघे?

सम्पाति अपनी बात पूरी करता है। जो सौ योजन सागर लाँघेगा, वही राम-काज करेगा। मुझे देखकर धीरज धरो, राम-कृपा से मेरा शरीर कैसा हो गया। जिसका नाम स्मरण करके पापी भी भवसागर तर जाते हैं, तुम उन्हीं के दूत हो; कायरता छोड़कर, राम को हृदय में रखकर उपाय करो। शिवजी उमा से कहते हैं कि गीध के जाने पर वानर विस्मित होते हैं। सब अपना बल बताते हैं, पर पार जाने में सबको संशय है। जाम्बवान कहते हैं, मैं बूढ़ा हो गया, पहले के बल का लेश भी नहीं रहा। जब प्रभु बलि को बाँधने के लिए त्रिविक्रम होकर बढ़े, तब मैं तरुण था; उस अवर्णनीय शरीर की मैंने दो घड़ी में दौड़कर सात प्रदक्षिणा कर दी थी।

29.1

जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम-काज मति-आगर ॥
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम-कृपाँ कस भयउ सरीरा ॥

jo nāghai sata jojana sāgara | karai so rāma-kāja mati-āgara ||
mohi biloki dharahu mana dhīrā | rāma-kṛpām̐ kasa bhayau sarīrā ||

29.2

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं । अति-अपार-भवसागर तरहीँ ॥
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई । राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥

pāpiu jā kara nāma sumirahīṃ | ati-apāra-bhavasāgara tarahīm̐ ||
tāsu dūta tumha taji kadarāī | rāma hṛdayam̐ dhari karahu upāī ||

29.3

अस काह, उमा गीध जब गयऊ । तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ॥
निज निज बल सब काहूँ भाखा । पार जाइ कर संसय राखा ॥

asa kāha, umā gīdha jaba gayaū | tinha keṃ mana ati bisamaya bhayaū ||
nija nija bala saba kāhūm̐ bhākhā | pāra jāi kara saṃsaya rākhā ||

29.4

जरठ भयउँ, अब कहई रिछेसा । नहिँ तनु रहा प्रथम-बल-लेसा ॥
जबहिँ त्रिविक्रम भयउ खरारी । तब में तरुन रहेउँ बल भारी ॥

jaraṭha bhayaum̐, aba kahaī richesā | nahim̐ tanu rahā prathama-bala-lesā ||
jabahim̐ trivikrama bhayau kharārī | taba meṃ taruna raheum̐ bala bhārī ||

दो॰ 29दोहा

बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ, सो तनु बरनि न जाइ ।
उभय धरी महँ दीन्ही, सात प्रदच्छिन धाइ ॥

bali bām̐dhata prabhu bār̤heu, so tanu barani na jāi |
ubhaya dharī maham̐ dīnhī, sāta pradacchina dhāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0