सुन्दरकाण्ड

अध्याय 1: हनुमान का लंका के लिए छलाँग लगाना

9 श्लोक · 1 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

हनुमान का लंका के लिए छलाँग लगाना

काण्ड तीन संस्कृत श्लोकों से खुलता है: माया से मनुष्य बने जगदीश्वर श्रीराम की वन्दना, पूर्ण भक्ति और निष्काम मन की प्रार्थना, और सोने के पर्वत जैसे देहवाले हनुमान को प्रणाम। फिर कथा चलती है। जाम्बवान के वचन हनुमान को भाते हैं। वे वानरों से कहते हैं कि कन्द मूल फल खाकर तब तक मेरी राह देखना जब तक मैं सीता को देखकर न लौटूँ। रघुनाथ को हृदय में धरकर वे तट के एक पर्वत से उछलते हैं और वह पर्वत पाताल में धँस जाता है। वे श्रीराम के अमोघ बाण की तरह चलते हैं। समुद्र थकान मिटाने के लिए मैनाक को भेजता है। हनुमान उसे छूकर प्रणाम करते हैं और कहते हैं, रामकाज किए बिना मुझे विश्राम कहाँ।

1.श्लो॰ 1

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ।
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ॥
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं ।
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपाल चूड़ामणिम् ॥

śāntaṃ śāśvatamaprameyamanaghaṃ nirvāṇaśāntipradaṃ |
brahmāśambhuphaṇīndrasevyamaniśaṃ vedāntavedyaṃ vibhum ||
rāmākhyaṃ jagadīśvaraṃ suraguruṃ māyāmanuṣyaṃ hariṃ |
vande'haṃ karuṇākaraṃ raghuvaraṃ bhūpāla cūr̤āmaṇim ||

1.श्लो॰ 2

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये ।
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ॥
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे ।
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥

nānyā spṛhā raghupate hṛdaye'smadīye |
satyaṃ vadāmi ca bhavānakhilāntarātmā ||
bhaktiṃ prayaccha raghupuṅgava nirbharāṃ me |
kāmādidoṣarahitaṃ kuru mānasaṃ ca ||

1.श्लो॰ 3

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं ।
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ॥
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं ।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥

atulitabaladhāmaṃ hemaśailābhadehaṃ |
danujavanakṛśānuṃ jñānināmagragaṇyam ||
sakalaguṇanidhānaṃ vānarāṇāmadhīśaṃ |
raghupatipriyabhaktaṃ vātajātaṃ namāmi ||

1.1

जामवन्त के बचन सुहाये । सुनि हनुमन्त हृदय अति भाये ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कन्द मूल फल खाई ॥

jāmavanta ke bacana suhāye | suni hanumanta hṛdaya ati bhāye ||
taba lagi mohi parikhehu tumha bhāī | sahi dukha kanda mūla phala khāī ||

1.2

जब लगि आवउँ सीतहि देखी । होइहि काज मोहि हरष बिसेखी ॥
अस कहि नाइ सबन्हि कहूँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥

jaba lagi āvaum̐ sītahi dekhī | hoihi kāja mohi haraṣa bisekhī ||
asa kahi nāi sabanhi kahūm̐ māthā | caleu haraṣi hiyam̐ dhari raghunāthā ||

1.3

सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवन-तनय बल भारी ॥

sindhu tīra eka bhūdhara sundara | kautuka kūdi car̤heu tā ūpara ||
bāra bāra raghubīra sam̐bhārī | tarakeu pavana-tanaya bala bhārī ||

1.4

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमन्ता । चलेउ सो गा पाताल तुरन्ता ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । तेही भाँति चलेउ हनुमाना ॥

jehiṃ giri carana dei hanumantā | caleu so gā pātāla turantā ||
jimi amogha raghupati kara bānā | tehī bhām̐ti caleu hanumānā ||

1.5

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥

jalanidhi raghupati dūta bicārī | taiṃ maināka hohi śramahārī ||

दो॰ 1दोहा

हनूमान तेहि परसा, कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।
राम-काज कीन्हें बिनु, मोहि कहाँ बिश्राम ॥

hanūmāna tehi parasā, kara puni kīnha pranāma |
rāma-kāja kīnheṃ binu, mohi kahām̐ biśrāma ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0