किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 27: सम्पाति का जटायु का समाचार सुनना

7 श्लोक · 27 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

सम्पाति का जटायु का समाचार सुनना

पर्वत की गुफा में सम्पाति गीध वानरों की बातें सुनता है। बाहर आकर कहता है, जगदीश्वर ने मुझे आहार भेजा है; बहुत दिनों से भूखा हूँ, कभी पेट नहीं भरा, आज सबको खा जाऊँगा। वानर मृत्यु निश्चित मानते हैं और जाम्बवान बहुत चिन्तित होते हैं। अंगद विचारकर कहते हैं, जटायु धन्य है, जिसने राम-काज के लिए शरीर त्यागा और हरिधाम गया। हर्ष और शोक से भरी यह वाणी सुनकर पक्षी पास आता है, डरे हुए वानरों को अभय देता है और उनकी कथा पूछता है। भाई की करनी सुनकर सम्पाति रघुपति की महिमा का बखान करता है और कहता है, मुझे सागर-तट ले चलो, जटायु को तिलांजलि दूँ; फिर वचन से तुम्हारी सहायता करूँगा।

27.1

एहि बिधि कथा कहहिँ बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी सम्पाती ॥
बाहेर होइ देखि बहु कीसा । मोहि अहार दीन्ह जगदीसा ॥

ehi bidhi kathā kahahim̐ bahu bhām̐tī giri kaṃdarām̐ sunī sampātī ||
bāhera hoi dekhi bahu kīsā | mohi ahāra dīnha jagadīsā ||

27.2

आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ । दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ ॥
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा । आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा ॥

āju sabahi kaham̐ bhacchana karaūm̐ | dina bahu cale ahāra binu maraūm̐ ||
kabahum̐ na mila bhari udara ahārā | āju dīnha bidhi ekahiṃ bārā ||

27.3

डरपे गीध बचन सुनि काना । अब भा मरन सत्य हम जाना ॥
कपि सब उठे गीध कहँ देखी । जामवन्त मन सोच बिसेखी ॥

ḍarape gīdha bacana suni kānā | aba bhā marana satya hama jānā ||
kapi saba uṭhe gīdha kaham̐ dekhī | jāmavanta mana soca bisekhī ||

27.4

कह अङ्गद बिचारि मन माहीं । धन्य जटायू सम कोउ नाहीं ॥
राम-काज-कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम-बड़ भागी ॥

kaha aṅgada bicāri mana māhīṃ | dhanya jaṭāyū sama kou nāhīṃ ||
rāma-kāja-kārana tanu tyāgī | hari pura gayau parama-bar̤a bhāgī ||

27.5

सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी ॥
तिन्हहिँ अभय करि पूछेसि जाई । कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ॥

suni khaga haraṣa soka juta bānī | āvā nikaṭa kapinha bhaya mānī ||
tinhahim̐ abhaya kari pūchesi jāī | kathā sakala tinha tāhi sunāī ||

27.6

सुनि सम्पाति बन्धु कै करनी । रघुपति महिमा बहु बिधि बरनी ॥

suni sampāti bandhu kai karanī | raghupati mahimā bahu bidhi baranī ||

दो॰ 27दोहा

मोहि लेइ जाहु सिन्धु तट, देउँ तिलाञ्जलि ताहि ।
बचन सहाय करबि मैं, पैहहु खोजहु जाहि ॥

mohi lei jāhu sindhu taṭa, deum̐ tilāñjali tāhi |
bacana sahāya karabi maiṃ, paihahu khojahu jāhi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0