किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 26: सागर-तट पर निराशा और जाम्बवान का उपदेश

8 श्लोक · 26 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

सागर-तट पर निराशा और जाम्बवान का उपदेश

इधर वानर मन में सोचते हैं कि अवधि बीत गई और काम कुछ न हुआ; बिना सुधि लिए क्या करेंगे? अंगद आँखों में आँसू भरकर कहते हैं, हमारी मृत्यु दोनों ओर है: यहाँ सीता की सुधि न मिली, वहाँ जाने पर कपिराज मार डालेंगे। वीर रो पड़ते हैं, फिर कहते हैं, हे युवराज, सीता की सुधि लिए बिना हम नहीं लौटेंगे। यह कहकर सब खारे सागर के किनारे कुशा बिछाकर बैठ जाते हैं। अंगद का दुःख देखकर जाम्बवान उपदेश देते हैं: तात, श्रीराम को मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण, अजेय, अजन्मा ब्रह्म जानो। प्रभु अपनी इच्छा से देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों के लिए अवतार लेते हैं, और हम जैसे सगुण के प्रेमी बड़भागी सेवक मोक्ष-सुख छोड़कर उनके साथ रहते हैं।

26.1

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं । बीती अवधि काज कछु नाहीँ ॥
सब मिलि कहहिं परसपर बाता । बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता ॥

ihām̐ bicārahiṃ kapi mana māhīṃ | bītī avadhi kāja kachu nāhīm̐ ||
saba mili kahahiṃ parasapara bātā | binu sudhi laem̐ karaba kā bhrātā ||

26.2

कह अङ्गद लोचन भरि बारी । दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ॥
इहाँ न सुधि सीता के पाई । उहाँ गये मारिहि कपिराई ॥

kaha aṅgada locana bhari bārī | duhum̐ prakāra bhai mṛtyu hamārī ||
ihām̐ na sudhi sītā ke pāī | uhām̐ gaye mārihi kapirāī ||

26.3

पिता बधे पर मारत मोही । राखा राम निहोर न ओही ॥
पुनि पुनि अङ्गद कह सब पाहीँ । मरन भयउ कछु संसय नाहीं ॥

pitā badhe para mārata mohī | rākhā rāma nihora na ohī ||
puni puni aṅgada kaha saba pāhīm̐ | marana bhayau kachu saṃsaya nāhīṃ ||

26.4

अङ्गद बचन सुनत कपि बीरा । बोलि न सकहिँ नयन बह नीरा ॥
छन एक सोच मगन होइ रहे । पुनि अस बचन कहत सब भए ॥

aṅgada bacana sunata kapi bīrā | boli na sakahim̐ nayana baha nīrā ||
chana eka soca magana hoi rahe | puni asa bacana kahata saba bhae ||

26.5

हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना । नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना ॥
अस कहि लवन-सिन्धु-तट जाई । बैठे कपि सब दर्भ डसाई ॥

hama sītā kai sudhi linheṃ binā | nahiṃ jaiṃhaiṃ jubarāja prabīnā ||
asa kahi lavana-sindhu-taṭa jāī | baiṭhe kapi saba darbha ḍasāī ||

26.6

जामवन्त अङ्गद दुख देखी । कही कथा उपदेस बिसेखी ॥
तात राम कह नर जनि मानहु । निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ॥

jāmavanta aṅgada dukha dekhī | kahī kathā upadesa bisekhī ||
tāta rāma kaha nara jani mānahu | nirguna brahma ajita aja jānahu ||

26.7

हम सब सेवक अति-बड़ भागी । सन्तत सगुन-ब्रह्म-अनुरागी ॥

hama saba sevaka ati-bar̤a bhāgī | santata saguna-brahma-anurāgī ||

दो॰ 26दोहा

निज इच्छा प्रभु अवतरइ, सुर-महि-गो-द्विज लागि ।
सगुन उपासक सङ्ग तहँ, रहहिं मोच्छ-सुख त्यागि ॥

nija icchā prabhu avatarai, sura-mahi-go-dvija lāgi |
saguna upāsaka saṅga taham̐, rahahiṃ moccha-sukha tyāgi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0