दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा । पूछें निज वृत्तान्त सुनावा ॥
तेहिं तब कहा करहु जल पाना । खाहु सुरस सुन्दर फल नाना ॥
dūri te tāhi sabanhi sira nāvā | pūcheṃ nija vṛttānta sunāvā ||
tehiṃ taba kahā karahu jala pānā | khāhu surasa sundara phala nānā ||
5 श्लोक · 25 में से 30
वानर दूर से ही उस तपस्विनी को सिर नवाते हैं और पूछने पर अपना वृत्तान्त सुनाते हैं। वह कहती है, जल पियो और अनेक प्रकार के रसीले, सुन्दर फल खाओ। तब वह अपनी कथा सुनाती है और कहती है, अब मैं वहाँ जाऊँगी जहाँ रघुराई हैं। आँखें मूँद लो, गुफा से बाहर पहुँच जाओगे; सीता को पाओगे, पछताओ मत। वीर आँखें मूँदकर फिर खोलते हैं तो सब समुद्र के किनारे खड़े हैं। वह स्वयं रघुनाथ के पास जाकर उनके चरण-कमलों में सिर नवाती है और अनेक प्रकार से विनती करती है; प्रभु उसे अनपायनी भक्ति देते हैं। प्रभु की आज्ञा सिर पर धरकर, ब्रह्मा और शिव जिनकी वन्दना करते हैं उन युगल चरणों को हृदय में रखकर, वह बदरीवन चली जाती है।
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा । पूछें निज वृत्तान्त सुनावा ॥
तेहिं तब कहा करहु जल पाना । खाहु सुरस सुन्दर फल नाना ॥
dūri te tāhi sabanhi sira nāvā | pūcheṃ nija vṛttānta sunāvā ||
tehiṃ taba kahā karahu jala pānā | khāhu surasa sundara phala nānā ||
मज्जन कीन्ह मधुर फल खाये । तासु निकट पुनि सब चलि आये ॥
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई । मैं अब जाब जहाँ, रघुराई ॥
majjana kīnha madhura phala khāye | tāsu nikaṭa puni saba cali āye ||
tehiṃ saba āpani kathā sunāī | maiṃ aba jāba jahām̐, raghurāī ||
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू । पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ॥
नयन मूदि पुनि देखहिँ बीरा । ठाढ़े सकल सिन्धु कें तीरा ॥
mūdahu nayana bibara taji jāhū | paihahu sītahi jani pachitāhū ||
nayana mūdi puni dekhahim̐ bīrā | ṭhār̤he sakala sindhu keṃ tīrā ||
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा । जाइ कमल-पद नाएसि माथा ॥
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही । अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ॥
so puni gaī jahām̐ raghunāthā | jāi kamala-pada nāesi māthā ||
nānā bhām̐ti binaya tehiṃ kīnhī | anapāyanī bhagati prabhu dīnhī ||
बदरीबन कहूँ सो गई, प्रभु अज्ञा धरि सीस ।
उर धरि राम-चरन जुग, जे बन्दत-अज-ईस ॥
badarībana kahūm̐ so gaī, prabhu ajñā dhari sīsa |
ura dhari rāma-carana juga, je bandata-aja-īsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0