सुनहु नील अङ्गद हनुमाना । जामवन्त मतिधीर सुजाना ॥
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू । सीता सुधि पूँछेउ सब काहू ॥
sunahu nīla aṅgada hanumānā | jāmavanta matidhīra sujānā ||
sakala subhaṭa mili dacchina jāhū | sītā sudhi pūm̐cheu saba kāhū ||
8 श्लोक · 23 में से 30
सुग्रीव अपने श्रेष्ठ वीरों को दक्षिण भेजते हैं: नील, अंगद, हनुमान और धीर, बुद्धिमान जाम्बवान। सबसे सीता की सुधि पूछना। सूर्य को पीठ से, अग्नि को छाती से, और स्वामी को छल छोड़कर सब भाव से सेवना चाहिए। देह पाने का यही फल है कि सब कामनाएँ छोड़कर राम को भजें। सब रघुराई को स्मरते चलते हैं। सबसे पीछे हनुमान सिर नवाते हैं; काम उन्हीं से होगा, यह जानकर प्रभु उन्हें पास बुलाते हैं, कमल-से हाथ से सिर छूते हैं और अपनी मुद्रिका देते हैं: सीता को समझाना, मेरा बल और विरह कहकर जल्दी लौटना। प्रभु सब जानकर भी राजनीति रखते हैं। राम-काज में लीन वानर नदी, सरोवर, पर्वत और गुफाएँ खोजते हैं, शरीर का मोह भी भूल जाते हैं।
सुनहु नील अङ्गद हनुमाना । जामवन्त मतिधीर सुजाना ॥
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू । सीता सुधि पूँछेउ सब काहू ॥
sunahu nīla aṅgada hanumānā | jāmavanta matidhīra sujānā ||
sakala subhaṭa mili dacchina jāhū | sītā sudhi pūm̐cheu saba kāhū ||
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु । रामचन्द्र कर काज सँवारेहु ॥
भानु पीठि सेइअ उर आगी । स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी ॥
mana krama bacana so jatana bicārehu | rāmacandra kara kāja sam̐vārehu ||
bhānu pīṭhi seia ura āgī | svāmihi sarva bhāva chala tyāgī ||
तजि माया सेइअ परलोका । मिटहिं सकल भव-सम्भव-सोका ॥
देह धरे कर यह फल भाई । भजिअ राम सब काम बिहाई ॥
taji māyā seia paralokā | miṭahiṃ sakala bhava-sambhava-sokā ||
deha dhare kara yaha phala bhāī | bhajia rāma saba kāma bihāī ||
सोइ गुनज्ञ साई बड़ भागी । जो रघुबीर-चरन-अनुरागी ॥
आयसु माँगि चरन सिर नाई । चले हरषि सुमिरत रघुराई ॥
soi gunajña sāī bar̤a bhāgī | jo raghubīra-carana-anurāgī ||
āyasu mām̐gi carana sira nāī | cale haraṣi sumirata raghurāī ||
पाछें पवन-तनय सिर नावा । जानि काज प्रभु निकट बोलावा ॥
परसा सीस सरोरुह-पानी । कर-मुद्रिका दीन्हि जन जानी ॥
pācheṃ pavana-tanaya sira nāvā | jāni kāja prabhu nikaṭa bolāvā ||
parasā sīsa saroruha-pānī | kara-mudrikā dīnhi jana jānī ||
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु । कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ॥
हनुमत जनम सुफल करि माना । चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ॥
bahu prakāra sītahi samujhāehu | kahi bala biraha begi tumha āehu ||
hanumata janama suphala kari mānā | caleu hṛdayam̐ dhari kṛpānidhānā ||
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता । राजनीति राखत सुर-त्राता ॥
jadyapi prabhu jānata saba bātā | rājanīti rākhata sura-trātā ||
चले सकल बन खोजत, सरिता सर गिरि खोह ।
राम-काज लयलीन मन, बिसरा तन कर छोह ॥
cale sakala bana khojata, saritā sara giri khoha |
rāma-kāja layalīna mana, bisarā tana kara choha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0