किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 16: शरद ऋतु का आगमन और निर्मल मन के दृष्टान्त

6 श्लोक · 16 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

शरद ऋतु का आगमन और निर्मल मन के दृष्टान्त

वर्षा बीतती है और शरद ऋतु आती है। श्रीराम कहते हैं, लक्ष्मण, देखो, कितनी सुहावनी है। फूले हुए काँस से धरती ढक गई है, मानो वर्षा ने अपना बुढ़ापा प्रकट कर दिया। अगस्त्य तारे के उदय से रास्तों का जल सूख गया, जैसे सन्तोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल मद और मोह से रहित सन्त-हृदय जैसा है। शरद जानकर खंजन पक्षी आ गए, जैसे समय पर सुकृत फल देते हैं। बिना बादल का आकाश सब आशा छोड़ चुके हरिभक्त जैसा निर्मल है। कहीं-कहीं थोड़ी वर्षा होती है, जैसे मेरी भक्ति कोई विरला पाता है। राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी हर्षित होकर निकल पड़ते हैं, जैसे हरिभक्ति पाकर चारों आश्रमी श्रम छोड़ देते हैं।

16.1

बरषा बिगत सरद रितु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई ॥
फूलें कास सकल महि छाई । जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई ॥

baraṣā bigata sarada ritu āī | lachimana dekhahu parama suhāī ||
phūleṃ kāsa sakala mahi chāī | janu baraṣām̐ kṛta pragaṭa bur̤hāī ||

16.2

उदित अगस्ति पन्थ जल सोषा । जिमि लोभहि सोखइ सन्तोखा ॥
सरिता-सर निर्मल जल सोहा । सन्त हृदय जस गत-मद मोहा ॥

udita agasti pantha jala soṣā | jimi lobhahi sokhai santokhā ||
saritā-sara nirmala jala sohā | santa hṛdaya jasa gata-mada mohā ||

16.3

रस रस सूख सरित सर पानी । ममता त्याग करहिँ जिमि ज्ञानी ॥
जानि सरद-रितु खंजन आये । पाइ समय जिमि सुकृत सुहाये ॥

rasa rasa sūkha sarita sara pānī | mamatā tyāga karahim̐ jimi jñānī ||
jāni sarada-ritu khaṃjana āye | pāi samaya jimi sukṛta suhāye ||

16.4

पंक न रेनु सोह असि धरनी । नीति निपुन नृप के जसि करनी ॥
जल सङ्कोच बिकल भइँ मीना । अबुध कुटुम्बी जिमि धन हीना ॥

paṃka na renu soha asi dharanī | nīti nipuna nṛpa ke jasi karanī ||
jala saṅkoca bikala bhaim̐ mīnā | abudha kuṭumbī jimi dhana hīnā ||

16.5

बिनु धन निर्मल सोह अकासा । हरिजन इव परिहरि सब आसा ॥
कहुँ कहुँ वृष्टि सारदी थोरी । कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ॥

binu dhana nirmala soha akāsā | harijana iva parihari saba āsā ||
kahum̐ kahum̐ vṛṣṭi sāradī thorī | kou eka pāva bhagati jimi morī ||

दो॰ 16दोहा

चले हरषि तजि नगर नप, तापस बनिक भिखारि ।
जिमि हरिभगति पाइ श्रम, तजहि आश्रमी चारि ॥

cale haraṣi taji nagara napa, tāpasa banika bhikhāri |
jimi haribhagati pāi śrama, tajahi āśramī cāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0