किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 15: वर्षा के और दृष्टान्त, धर्म और अधर्म के

8 श्लोक · 15 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

वर्षा के और दृष्टान्त, धर्म और अधर्म के

मेंढकों की ध्वनि चारों ओर ऐसी सुहाती है मानो ब्रह्मचारियों का समूह वेद पढ़ रहा हो। आक और जवासे के पत्ते झड़ जाते हैं, जैसे सुराज में दुष्टों का उद्यम मिट जाता है। अँधेरी रात में जुगनू ऐसे चमकते हैं मानो दम्भियों का समाज जुटा हो। श्रीराम कहते हैं, भारी वर्षा से क्यारियाँ फूट जाती हैं, जैसे स्वतन्त्र होकर स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेत निराते हैं, जैसे बुद्धिमान मोह, मद और मान त्यागते हैं। चकवा पक्षी नहीं दिखता, जैसे कलियुग में धर्म भाग जाता है। कभी दिन में अँधेरा, कभी सूर्य, जैसे कुसंग और सुसंग से ज्ञान मिटता और उपजता है।

15.1

दादुर धुनि चहुँ दिसा सुहाई । बेद पढ़हिँ जनु बटु समुदाई ॥
नव पल्लव भये बिटप अनेका । साधक मन जस मिलें बिबेका ॥

dādura dhuni cahum̐ disā suhāī | beda par̤hahim̐ janu baṭu samudāī ||
nava pallava bhaye biṭapa anekā | sādhaka mana jasa mileṃ bibekā ||

15.2

अर्क जवास पात बिनु भयऊ । जस सुराज खल उद्यम गयऊ ॥
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी । करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी ॥

arka javāsa pāta binu bhayaū | jasa surāja khala udyama gayaū ||
khojata katahum̐ milai nahiṃ dhūrī | karai krodha jimi dharamahi dūrī ||

15.3

ससि-सम्पन्न सोह महि कैसी । उपकारी के सम्पति जैसी ॥
निसि तम घन खद्योत बिराजा । जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा ॥

sasi-sampanna soha mahi kaisī | upakārī ke sampati jaisī ||
nisi tama ghana khadyota birājā | janu daṃbhinha kara milā samājā ||

15.4

महावृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतन्त्र भये बिगरहिँ नारीं ॥
कृषी निरावहिं चतुर किसाना । जिमि बुध तजहिँ मोह-मद माना ॥

mahāvṛṣṭi cali phūṭi kiārīṃ | jimi sutantra bhaye bigarahim̐ nārīṃ ||
kṛṣī nirāvahiṃ catura kisānā | jimi budha tajahim̐ moha-mada mānā ||

15.5

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धरम पराहीं ॥
ऊषर बरषइ तृन नहिँ जामा । जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ॥

dekhiata cakrabāka khaga nāhīṃ | kalihi pāi jimi dharama parāhīṃ ||
ūṣara baraṣai tṛna nahim̐ jāmā | jimi harijana hiyam̐ upaja na kāmā ||

15.6

बिबिध जन्तु सङ्कुल महि भ्राजा । प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा ॥
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना । जिमि इंद्रिय गन उपजें ज्ञाना ॥

bibidha jantu saṅkula mahi bhrājā | prajā bār̤ha jimi pāi surājā ||
jaham̐ taham̐ rahe pathika thaki nānā | jimi iṃdriya gana upajeṃ jñānā ||

दो॰ 15 (क)दोहा

कबहुँ प्रबल बह मारुत, जहँ तहँ मेघ बिलाहिँ ।
जिमि कपूत के उपजें, कुल सद्धर्म नसाहिँ ॥

kabahum̐ prabala baha māruta, jaham̐ taham̐ megha bilāhim̐ |
jimi kapūta ke upajeṃ, kula saddharma nasāhim̐ ||

दो॰ 15 (ख)दोहा

कबहुँ दिवस महं निबिड़ तम, कबहुँक प्रगट पतङ्ग ।
बिनसइ उपजइ ज्ञान जिमि, पाइ कुसङ्ग सुसङ्ग ॥

kabahum̐ divasa mahaṃ nibir̤a tama, kabahum̐ka pragaṭa pataṅga |
binasai upajai jñāna jimi, pāi kusaṅga susaṅga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0