किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 17: शरद के सरोवर, चन्द्रमा और सद्गुरु

5 श्लोक · 17 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

शरद के सरोवर, चन्द्रमा और सद्गुरु

श्रीराम के वचनों में शरद के दृश्य चलते रहते हैं। गहरे जल की मछलियाँ सुखी हैं, जैसे हरि की शरण में एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों से भरे सरोवर ऐसे सोहते हैं जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण हो गया हो। पपीहा प्यास से रटता रहता है, जैसे शंकरद्रोही कभी सुख नहीं पाता। शरद का चन्द्रमा रात में दिन की तपन हर लेता है, जैसे सन्त के दर्शन से पाप टल जाते हैं। चकोरों के झुण्ड चन्द्रमा को ऐसे निहारते हैं जैसे हरिभक्त हरि को पाकर। ठण्ड से मच्छर और डाँस मिट गए, जैसे ब्राह्मण-द्रोह से कुल का नाश होता है। वर्षा में धरती पर भरे जीव शरद पाकर चले गए, जैसे सद्गुरु मिलने पर संशय और भ्रम का समूह मिट जाता है।

17.1

सुखी मीन जे नीर अगाधा । जिमि हरि-सरन न एकउ बाधा ॥
फूलें कमल सोह सर कैसा । निर्गुन ब्रम्ह सगुन भये जैसा ॥

sukhī mīna je nīra agādhā | jimi hari-sarana na ekau bādhā ||
phūleṃ kamala soha sara kaisā | nirguna bramha saguna bhaye jaisā ||

17.2

गुञ्जत-मधुकर मुखर अनूपा । सुन्दर खग रव नाना रूपा ॥
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी । जिमि दुर्जन पर सम्पति देखी ॥

guñjata-madhukara mukhara anūpā | sundara khaga rava nānā rūpā ||
cakrabāka mana dukha nisi paikhī | jimi durjana para sampati dekhī ||

17.3

चातक रटत तृषा अति ओही । जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही ॥
सरदातप निसि ससि अपहरई । सन्त दरस जिमि पातक टरई ॥

cātaka raṭata tṛṣā ati ohī | jimi sukha lahai na saṃkaradrohī ||
saradātapa nisi sasi apaharaī | santa darasa jimi pātaka ṭaraī ||

17.4

देखि इन्दु चकोर-समुदाई । चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई ॥
मसक-दंस बीते हिम त्रासा । जिमि द्विज-द्रोह किये कुल नासा ॥

dekhi indu cakora-samudāī | citavatahiṃ jimi harijana hari pāī ||
masaka-daṃsa bīte hima trāsā | jimi dvija-droha kiye kula nāsā ||

दो॰ 17दोहा

भूमि जीव सङ्कुल रहे, गये सरद रितु पाइ ।
सदगुरु मिले जाहिँ जिमि, संसय-भ्रम-समुदाइ ॥

bhūmi jīva saṅkula rahe, gaye sarada ritu pāi |
sadaguru mile jāhim̐ jimi, saṃsaya-bhrama-samudāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0