किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 13: स्फटिक शिला पर श्रीराम और वर्षा का आगमन

5 श्लोक · 13 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

स्फटिक शिला पर श्रीराम और वर्षा का आगमन

पर्वत का वन फूलों से शोभित है, मधु के लोभी भौंरे गूँजते हैं, और प्रभु के आने से कन्द, मूल, फल और पत्ते बहुत हो गए हैं। उसी अनुपम पर्वत पर श्रीराम भाई सहित रहते हैं। देवता, सिद्ध और मुनि भौंरे, पक्षी और हिरन का शरीर धरकर प्रभु की सेवा करते हैं, और जब से रमापति वहाँ बसे, वन मंगलमय हो गया। अत्यन्त उजली स्फटिक शिला पर दोनों भाई सुख से बैठे हैं, और श्रीराम छोटे भाई से भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की अनेक कथाएँ कहते हैं। वर्षा ऋतु आती है, आकाश में मेघ छा जाते हैं और उनका गरजना बहुत सुहावना लगता है। श्रीराम कहते हैं, लक्ष्मण, देखो, मोर बादल देखकर वैसे ही नाचते हैं जैसे वैराग्य में रत गृहस्थ विष्णुभक्त को देखकर हर्षित होता है।

13.1

सुन्दर बन कुसुमित अति सोभा । गुञ्जत मधुप निकर मधु लोभा ॥
कन्द मूल फल पत्र सुहाये । भए बहुत जब तें प्रभु आये ॥

sundara bana kusumita ati sobhā | guñjata madhupa nikara madhu lobhā ||
kanda mūla phala patra suhāye | bhae bahuta jaba teṃ prabhu āye ||

13.2

देखि मनोहर सैल अनूपा । रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा ॥
मधुकर-खग-मृग-तनु धरि देवा । करहिँ सिद्ध मुनि प्रभु के सेवा ॥

dekhi manohara saila anūpā | rahe taham̐ anuja sahita surabhūpā ||
madhukara-khaga-mṛga-tanu dhari devā | karahim̐ siddha muni prabhu ke sevā ||

13.3

मङ्गल-रूप भयउ बन तब तें । कीन्ह निवास रमापति जय तें ॥
फटिक-सिला अति सुभ्र सुहाई । सुख-आसीन तहाँ दोउ भाई ॥

maṅgala-rūpa bhayau bana taba teṃ | kīnha nivāsa ramāpati jaya teṃ ||
phaṭika-silā ati subhra suhāī | sukha-āsīna tahām̐ dou bhāī ||

13.4

कहत अनुज सन कथा अनेका । भगति बिरति नृप-नीति बिबेका ॥
बरषा काल मेघ नभ छाये । गरजत लागत परम-सुहाये ॥

kahata anuja sana kathā anekā | bhagati birati nṛpa-nīti bibekā ||
baraṣā kāla megha nabha chāye | garajata lāgata parama-suhāye ||

दो॰ 13दोहा

लछिमन देखु मोर-गन, नाचत बारिद पैखि ।
गृही बिरति-रत हरष जस, बिष्नु भगत कह देखि ॥

lachimana dekhu mora-gana, nācata bārida paikhi |
gṛhī birati-rata haraṣa jasa, biṣnu bhagata kaha dekhi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0