किष्किन्धाकाण्ड

अध्याय 12: राम-सा हितैषी नहीं; प्रवर्षण पर वर्षावास

6 श्लोक · 12 में से 30

इस अध्याय में क्या होता है

राम-सा हितैषी नहीं; प्रवर्षण पर वर्षावास

शिवजी उमा से कहते हैं कि जगत में श्रीराम जैसा हितैषी न गुरु है, न पिता, माता, भाई या स्वामी; देवता, मनुष्य और मुनि सब स्वार्थ से प्रीति करते हैं। जो सुग्रीव बालि के डर से दिन-रात व्याकुल था, जिसका शरीर घावों से भरा और छाती चिन्ता से जलती थी, उसे रघुवीर ने वानरराज बना दिया। ऐसे प्रभु को जानकर भी जो छोड़ते हैं, वे विपत्ति के जाल में क्यों न पड़ें? फिर श्रीराम सुग्रीव को राजनीति सिखाते हैं। चौदह वर्ष मैं नगर नहीं जाऊँगा; गर्मी बीत गई, वर्षा आ गई, मैं पास के पर्वत पर रहूँगा। अंगद के साथ राज्य करो और मेरा काम सदा हृदय में रखो। सुग्रीव घर लौटते हैं और श्रीराम प्रवर्षण पर्वत पर ठहरते हैं, जहाँ देवताओं ने पहले से सुन्दर गुफा सजा रखी थी।

12.1

उमा राम सम हित जग माहीं । गुरु पितु मातु बन्धु प्रभु नाहीँ ॥
सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥

umā rāma sama hita jaga māhīṃ | guru pitu mātu bandhu prabhu nāhīm̐ ||
sura nara muni saba kai yaha rītī | svāratha lāgi karahiṃ saba prītī ||

12.2

बालि त्रास ब्याकुल दिन राती । तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती ॥
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ । अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ ॥

bāli trāsa byākula dina rātī | tana bahu brana ciṃtām̐ jara chātī ||
soi sugrīva kīnha kapirāū | ati kṛpāla raghubīra subhāū ||

12.3

जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं । काहे न बिपति-जाल नर परहीं ॥
पुनि सुग्रीवहिं लीन्ह बोलाई । बहु प्रकार नृप-नीति सिखाई ॥

jānatahūm̐ asa prabhu pariharahīṃ | kāhe na bipati-jāla nara parahīṃ ||
puni sugrīvahiṃ līnha bolāī | bahu prakāra nṛpa-nīti sikhāī ||

12.4

कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा । पुर न जाउँ दस-चारि बरीसा ॥
गत ग्रीषम बरषा-रितु आई । रहिहउँ निकट सैल पर छाई ॥

kaha prabhu sunu sugrīva harīsā | pura na jāum̐ dasa-cāri barīsā ||
gata grīṣama baraṣā-ritu āī | rahihaum̐ nikaṭa saila para chāī ||

12.5

अङ्गद सहित करहु तुम्ह राजू । सन्तत हृदय धरेहु मम काजू ॥
जब सुग्रीव भवन फिरि आये । राम प्रबरषन गिरि पर छाये ॥

aṅgada sahita karahu tumha rājū | santata hṛdaya dharehu mama kājū ||
jaba sugrīva bhavana phiri āye | rāma prabaraṣana giri para chāye ||

दो॰ 12दोहा

प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ ।
राम कृपानिधि कछु दिन, बास करहिंगे आइ ॥

prathamahiṃ devanha giri guhā rākheu rucira banāi |
rāma kṛpānidhi kachu dina, bāsa karahiṃge āi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0