राम बालि निज धाम पठावा । नगर लोग सब व्याकुल धावा ॥
नाना बिधि बिलाप कर तारा । छूटे केस न देह सँभारा ॥
rāma bāli nija dhāma paṭhāvā | nagara loga saba vyākula dhāvā ||
nānā bidhi bilāpa kara tārā | chūṭe kesa na deha sam̐bhārā ||
6 श्लोक · 11 में से 30
श्रीराम बालि को अपने धाम भेजते हैं और नगर के लोग व्याकुल होकर दौड़ते हैं। तारा अनेक प्रकार से विलाप करती है, केश खुले हैं, देह की सुध नहीं। उसे व्याकुल देखकर रघुराई ज्ञान देते हैं और उसकी माया हर लेते हैं: पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से बना यह शरीर तुम्हारे सामने सोया है, जीव नित्य है, फिर किसके लिए रोती हो? ज्ञान उपजने पर वह चरणों में लगकर परम भक्ति का वर माँग लेती है। शिवजी उमा से कहते हैं कि श्रीराम सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं। सुग्रीव विधिपूर्वक मृतक-कर्म करते हैं। श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि जाकर सुग्रीव को राज्य दो; लक्ष्मण पुरवासियों और ब्राह्मणों को बुलाकर सुग्रीव को राजा और अंगद को युवराज बनाते हैं।
राम बालि निज धाम पठावा । नगर लोग सब व्याकुल धावा ॥
नाना बिधि बिलाप कर तारा । छूटे केस न देह सँभारा ॥
rāma bāli nija dhāma paṭhāvā | nagara loga saba vyākula dhāvā ||
nānā bidhi bilāpa kara tārā | chūṭe kesa na deha sam̐bhārā ||
तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ज्ञान हरि लीन्ही माया ॥
छिति जल पावक गगन समीरा । पञ्च-रचित अति अधम सरीरा ॥
tārā bikala dekhi raghurāyā | dīnha jñāna hari līnhī māyā ||
chiti jala pāvaka gagana samīrā | pañca-racita ati adhama sarīrā ||
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥
उपजा ज्ञान चरन तब लागी । लीन्हेसि परम भगति बर मागी ॥
pragaṭa so tanu tava āgeṃ sovā | jīva nitya kehi lagi tumha rovā ||
upajā jñāna carana taba lāgī | līnhesi parama bhagati bara māgī ||
उमा दारु-जोषित की नाई । सबहि नचावत रामु गोसाई ॥
तब सुग्रीवहिं आयसु दीन्हा । मृतक-कर्म विधिवत सब कीन्हा ॥
umā dāru-joṣita kī nāī | sabahi nacāvata rāmu gosāī ||
taba sugrīvahiṃ āyasu dīnhā | mṛtaka-karma vidhivata saba kīnhā ||
राम कहां अनुजहि समुझाई । राज देहु सुग्रीवहिं जाई ॥
रघुपति चरन नाइ करि माथा । चले सकल प्रेरित रघुनाथा ॥
rāma kahāṃ anujahi samujhāī | rāja dehu sugrīvahiṃ jāī ||
raghupati carana nāi kari māthā | cale sakala prerita raghunāthā ||
लछिमन तुरत बोलाये, पुरजन विप्र-समाज ।
राज दीन्ह सुग्रीव कहँ, अङ्गद कहँ जुबराज ॥
lachimana turata bolāye, purajana vipra-samāja |
rāja dīnha sugrīva kaham̐, aṅgada kaham̐ jubarāja ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0