ऋषियों ने गिरिराज को सारा प्रसंग सुनाया। कामदहन सुनकर वे बहुत दुखी हुए, फिर रति को वरदान की बात सुनकर बहुत सुख माना। हृदय में शम्भु की प्रभुता विचारकर उन्होंने आदर से श्रेष्ठ मुनियों को बुलाया। शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोधवाकर वेदविधि से शीघ्र लग्न धराया। हिमाचल ने वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियों को दी और उनके चरण पकड़कर विनती की। उन्होंने जाकर वह पत्री ब्रह्मा को दी, जिसे पढ़ते हुए उनके हृदय में प्रेम न समाया। ब्रह्मा ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, सुनकर सारा देवसमाज हर्षित हुआ। आकाश से फूल बरसे, बाजे बजे और दसों दिशाओं में मंगल कलश सजाए गए। सब देवता अपने वाहन और विमान सजाने लगे, सुखद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं।