कह सिव जदपि उचित अस-नाहीँ । नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥
सिर धरि आयसु करिय तुम्हारा । परम धरम यह नाथ हमारा ॥
kaha siva jadapi ucita asa-nāhīm̐ | nātha bacana puni meṭi na jāhīṃ ||
sira dhari āyasu kariya tumhārā | parama dharama yaha nātha hamārā ||
5 श्लोक · 77 में से 361
शिव ने कहा, यद्यपि यह मेरे लिए उचित नहीं लगता, फिर भी स्वामी की बात टाली नहीं जा सकती। हे नाथ, आपकी आज्ञा सिर पर रखकर पालन करना ही मेरा परम धर्म है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की वाणी को शुभ जानकर बिना विचारे मानना चाहिए। भक्ति, विवेक और धर्म से युक्त शंकर के वचन सुनकर प्रभु सन्तुष्ट हुए और बोले, हे हर, तुम्हारा प्रण रह गया, अब जो हमने कहा उसे हृदय में रखना। ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गए और शंकर ने वही मूर्ति हृदय में रख ली। तभी सप्तर्षि शिव के पास आए। शिव ने कहा, तुम पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लो, फिर हिमाचल को प्रेरित कर उन्हें घर भिजवाओ और सन्देह दूर करो।
कह सिव जदपि उचित अस-नाहीँ । नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥
सिर धरि आयसु करिय तुम्हारा । परम धरम यह नाथ हमारा ॥
kaha siva jadapi ucita asa-nāhīm̐ | nātha bacana puni meṭi na jāhīṃ ||
sira dhari āyasu kariya tumhārā | parama dharama yaha nātha hamārā ||
मातु-पिता-गुरु-प्रभु कै बानी । बिनहिँ बिचार करिय सुभ जानी ॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अज्ञा सिर पर नाथ तुम्हारी ॥
mātu-pitā-guru-prabhu kai bānī | binahim̐ bicāra kariya subha jānī ||
tumha saba bhām̐ti parama hitakārī | ajñā sira para nātha tumhārī ||
प्रभु तोषेउ सुनि सङ्कर बचना । भगति-विवेक-धर्म जुत रचना ॥
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ । अब उर राखेहु जो हम जो कहेऊ ॥
prabhu toṣeu suni saṅkara bacanā | bhagati-viveka-dharma juta racanā ||
kaha prabhu hara tumhāra pana raheū | aba ura rākhehu jo hama jo kaheū ||
अन्तरधान भये अस भाखी । सङ्कर सोइ मूरति उर राखी ॥
तबहिँ सप्तरिषि सिव पहिँ आये । बोले प्रभु अति बचन सुहाये ॥
antaradhāna bhaye asa bhākhī | saṅkara soi mūrati ura rākhī ||
tabahim̐ saptariṣi siva pahim̐ āye | bole prabhu ati bacana suhāye ||
पारबती पहिँ जाइ तुम्ह, प्रेम परिच्छा लेहु ।
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन, दूरि करेहु सन्देहु ॥
pārabatī pahim̐ jāi tumha, prema paricchā lehu |
girihi preri paṭhaehu bhavana, dūri karehu sandehu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0