बालकाण्ड

अध्याय 78: सप्तर्षियों का पार्वती से प्रश्न

5 श्लोक · 78 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सप्तर्षियों का पार्वती से प्रश्न

ऋषियों ने वहाँ गौरी को ऐसा देखा मानो तपस्या ही मूर्ति धरकर बैठी हो। मुनि बोले, हे शैलकुमारी, तुम किस कारण इतना कठोर तप कर रही हो? किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे सारा सच्चा भेद कहो। ऋषियों के वचन सुनकर भवानी गूढ़ और मनोहर वाणी में बोलीं। भेद कहते हुए मन बहुत सकुचाता है, आप हमारी मूर्खता सुनकर हँसेंगे। मन ने हठ पकड़ लिया है, सीख नहीं सुनता, जल पर दीवार उठाना चाहता है। नारद ने जो कहा उसे सत्य मानकर हम बिना पंखों के उड़ना चाहते हैं। हे मुनि, हमारा अविवेक देखिए, हमें सदा शिव ही पति के रूप में चाहिए। यह सुनकर ऋषि हँसे और बोले, तुम्हारी देह पर्वत से उपजी है। बताओ, नारद का उपदेश सुनकर किसका घर बसा है?

78.1

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी । करहु कवन कारन तप भारी ॥

riṣinha gauri dekhī taham̐ kaisī | mūratimaṃta tapasyā jaisī ||
bole muni sunu sailakumārī | karahu kavana kārana tapa bhārī ||

78.2

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू । हम सन सत्य मरम सब कहहू ॥
कहत मरम मन अति सकुचाई । हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई ॥

kehi avarādhahu kā tumha cahahū | hama sana satya marama saba kahahū ||
kahata marama mana ati sakucāī | ham̐sihahu suni hamāri jar̤atāī ||

78.3

मन हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा ॥
नारद कहा सत्य सोइ जाना । बिनु पङ्खन्ह हम चहहिँ उड़ाना ॥

mana haṭha parā na sunai sikhāvā | cahata bāri para bhīti uṭhāvā ||
nārada kahā satya soi jānā | binu paṅkhanha hama cahahim̐ ur̤ānā ||

78.4

देखहु मुनि अबिबेक हमारा । चाहिय सदा सिवहि भरतारा ॥

dekhahu muni abibeka hamārā | cāhiya sadā sivahi bharatārā ||

दो॰ 78दोहा

सुनत बचन बिहँसे रिषय, गिरि-सम्भव तव देह ।
नारद कर उपदेस सुनि, कहहु बसेउ को गेह ॥

sunata bacana biham̐se riṣaya, giri-sambhava tava deha |
nārada kara upadesa suni, kahahu baseu ko geha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0