बालकाण्ड

अध्याय 68: माता पिता का शोक, उमा का हर्ष

5 श्लोक · 68 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

माता पिता का शोक, उमा का हर्ष

मुनि की वाणी को सत्य मानकर पति पत्नी दुखी हुए और उमा प्रसन्न हुईं। यह भेद नारद भी न जान पाए कि एक ही बात को दोनों ने अलग अलग समझा। सबके नेत्र भर आए। देवर्षि का कहा झूठा नहीं हो सकता, यह सोचकर उमा ने वह वचन हृदय में रख लिया। उनके मन में शिव के चरणकमलों में प्रेम उपजा, साथ ही यह सन्देह भी कि उनका मिलना कठिन है। अवसर उचित न जानकर उन्होंने प्रेम छिपा लिया और फिर सखी की गोद में जा बैठीं। देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह सोचकर सब चिन्तित हुए। धीरज धरकर गिरिराज ने उपाय पूछा। मुनीश्वर बोले, विधाता ने जो ललाट पर लिख दिया, उसे देव, दानव, मनुष्य, नाग या मुनि कोई नहीं मिटा सकता।

68.1

सुनि मुनि-गिरा सत्य जियँ जानी । दुख-दम्पतिहि उमा-हरषानी ॥
नारदहू यह भेद न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना ॥

suni muni-girā satya jiyam̐ jānī | dukha-dampatihi umā-haraṣānī ||
nāradahū yaha bheda na jānā | dasā eka samujhaba bilagānā ||

68.2

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना । पुलक सरीर भरे जल नैना ॥
होइ न मृषा देवरिषि भाखा । उमा सो वचन हृदयँ धरि राखा ॥

sakala sakhīṃ girijā giri mainā | pulaka sarīra bhare jala nainā ||
hoi na mṛṣā devariṣi bhākhā | umā so vacana hṛdayam̐ dhari rākhā ||

68.3

उपजेउ सिव-पद-कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा मन सन्देहू ॥
जानि कुअवसर प्रीति दुराई । सखी-उछङ्ग बैठि पुनि जाई ॥

upajeu siva-pada-kamala sanehū | milana kaṭhina mana bhā mana sandehū ||
jāni kuavasara prīti durāī | sakhī-uchaṅga baiṭhi puni jāī ||

68.4

झूठि न होइ देवरिषि बानी । सोचहिँ दम्पति सखीं सयानी ॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ । कहहु नाथ का करिय उपाऊ ॥

jhūṭhi na hoi devariṣi bānī | socahim̐ dampati sakhīṃ sayānī ||
ura dhari dhīra kahai girirāū | kahahu nātha kā kariya upāū ||

दो॰ 68दोहा

कह मुनीस हिमवन्त सुनु, जो विधि लिखा लिलार ।
देव दनुज नर नाग मुनि, कोउ न मेटनिहार ॥

kaha munīsa himavanta sunu, jo vidhi likhā lilāra |
deva danuja nara nāga muni, kou na meṭanihāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0