पर्वत पर सब नदियाँ पवित्र जल बहाने लगीं, पक्षी, मृग और भौंरे सुखी रहने लगे। सब जीवों ने स्वाभाविक बैर छोड़ दिया और सब पर्वत से प्रेम करने लगे। गिरिजा के घर आने से पर्वत ऐसे शोभित हुआ जैसे रामभक्ति पाकर भक्त शोभित होता है। उसके घर नित्य नए मंगल होते और ब्रह्मा आदि उसका यश गाते। नारद ने सब समाचार पाया और कौतुक से हिमाचल के घर पहुँचे। पर्वतराज ने बड़ा आदर किया, चरण धोकर उत्तम आसन दिया। पत्नी सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और चरणोदक सारे भवन में छिड़कवाया। अपने सौभाग्य का बहुत वर्णन करके पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों में डाल दिया और कहा कि आप त्रिकालदर्शी और सर्वज्ञ हैं, हृदय में विचारकर कन्या के गुण दोष बताइए।