बालकाण्ड

अध्याय 65: यज्ञ विध्वंस और हिमाचल के घर उमा

5 श्लोक · 65 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

यज्ञ विध्वंस और हिमाचल के घर उमा

शंकर ने सब समाचार पाकर क्रोध में वीरभद्र को भेजा। उसने जाकर यज्ञ का विध्वंस किया और सब देवताओं को यथोचित दण्ड दिया। दक्ष की वही गति जगत में प्रसिद्ध हुई जो शिवविमुख की होती है। यह इतिहास जगत जानता है, इसलिए संक्षेप में कहा गया। मरते समय सती ने हरि से यह वर माँगा था कि जन्म जन्म में शिव के चरणों में प्रेम रहे। इसी कारण वे हिमाचल के घर जाकर पार्वती के रूप में जन्मीं। जब से उमा पर्वतराज के घर आईं, वहाँ सब सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गईं। मुनियों ने जहाँ तहाँ सुन्दर आश्रम बनाए और हिमवान ने उन्हें उचित स्थान दिए। नाना जाति के वृक्ष सदा फूल फल से लदे रहने लगे और पर्वत पर अनेक मणियों की खानें प्रकट हुईं।

65.1

समाचार सब सङ्कर पाये । बीरभद्र करि कोप पठाये ॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा । सकल सुरन्ह बिधिवत फल दीन्हा ॥

samācāra saba saṅkara pāye | bīrabhadra kari kopa paṭhāye ||
jagya bidhaṃsa jāi tinha kīnhā | sakala suranha bidhivata phala dīnhā ||

65.2

भइ जग बिदित दच्छ-गति सोई । जसि कछु सम्भु-बिमुख कै होई ॥
यह इतिहास सकल जग जाना । ताते मैं संछेप बखाना ॥

bhai jaga bidita daccha-gati soī | jasi kachu sambhu-bimukha kai hoī ||
yaha itihāsa sakala jaga jānā | tāte maiṃ saṃchepa bakhānā ||

65.3

सतीं मरत हरि सन बर माँगा । जनम जनम सिव-पद अनुरागा ॥
तेहि कारन हिमगिरि-गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई ॥

satīṃ marata hari sana bara mām̐gā | janama janama siva-pada anurāgā ||
tehi kārana himagiri-gṛha jāī | janamīṃ pārabatī tanu pāī ||

65.4

जब तेँ उमा सैल-गृह-जाईं । सकल सिद्धि सम्पति तहँ छाई ॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्हें ॥

jaba tem̐ umā saila-gṛha-jāīṃ | sakala siddhi sampati taham̐ chāī ||
jaham̐ taham̐ muninha suāśrama kīnhe | ucita bāsa hima bhūdhara dīnheṃ ||

दो॰ 65दोहा

सदा सुमन फल सहित सब, द्रुम नव नाना जाति ।
प्रगटीं सुन्दर सैल पर, मनि-आकर बहु भाँति ॥

sadā sumana phala sahita saba, druma nava nānā jāti |
pragaṭīṃ sundara saila para, mani-ākara bahu bhām̐ti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0