सुनहु सभासद सकल मुनिन्दा । कही सुनी जिन्ह सङ्कर निन्दा ॥
सो फल तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥
sunahu sabhāsada sakala munindā | kahī sunī jinha saṅkara nindā ||
so phala turata lahaba saba kāhūm̐ | bhalī bhām̐ti pachitāba pitāhūm̐ ||
5 श्लोक · 64 में से 361
सती बोलीं, हे सभासदो और मुनीश्वरो, जिन्होंने शंकर की निन्दा कही या सुनी, वे सब तुरन्त उसका फल पाएँगे और मेरे पिता भी भली भाँति पछताएँगे। जहाँ सन्त, शम्भु या लक्ष्मीपति की निन्दा सुनाई पड़े, वहाँ मर्यादा यह है कि वश चले तो निन्दक की जीभ खींच ली जाए, नहीं तो कान बन्द करके वहाँ से चल दिया जाए। महेश जगत के आत्मा, जगत के पिता और सबके हितकारी हैं, मन्दबुद्धि पिता उन्हीं की निन्दा करते हैं। यह देह दक्ष के वीर्य से बनी है, इसलिए मैं इसे तुरन्त त्याग दूँगी। ऐसा कहकर, चन्द्रमौलि वृषकेतु को हृदय में धारण कर, उन्होंने योगाग्नि से शरीर जला दिया। यज्ञ में हाहाकार मच गया। शिवगण यज्ञ नष्ट करने लगे, तब भृगु मुनि ने उसकी रक्षा की।
सुनहु सभासद सकल मुनिन्दा । कही सुनी जिन्ह सङ्कर निन्दा ॥
सो फल तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥
sunahu sabhāsada sakala munindā | kahī sunī jinha saṅkara nindā ||
so phala turata lahaba saba kāhūm̐ | bhalī bhām̐ti pachitāba pitāhūm̐ ||
सन्त-सम्भु-श्रीपति अपबादा । सुनिय जहाँ तहँ असि मरजादा ॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई । स्रवन मूँदि न त चलिय पराई ॥
santa-sambhu-śrīpati apabādā | suniya jahām̐ taham̐ asi marajādā ||
kāṭia tāsu jībha jo basāī | sravana mūm̐di na ta caliya parāī ||
जगदातमा महेस पुरारी । जगत-जनक सब के हितकारी ॥
पिता-मन्दमति निन्दत तेही । दच्छ-सुक्र-सम्भव यह देही ॥
jagadātamā mahesa purārī | jagata-janaka saba ke hitakārī ||
pitā-mandamati nindata tehī | daccha-sukra-sambhava yaha dehī ||
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू । उर धरि चन्द्रमौलि बृषकेतू ॥
अस कहि जोग-अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा ॥
tajihaum̐ turata deha tehi hetū | ura dhari candramauli bṛṣaketū ||
asa kahi joga-agini tanu jārā | bhayau sakala makha hāhākārā ||
सती मरन सुनि सम्भु गन, लगे करन मख खीस ।
जग्य-बिधंस बिलोकि भृगु, रच्छा कीन्हि मुनीस ॥
satī marana suni sambhu gana, lage karana makha khīsa |
jagya-bidhaṃsa biloki bhṛgu, racchā kīnhi munīsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0