हृदयँ सोच समुझत निज करनी । चिन्ता अमित जाइ नहिँ बरनी ॥
कृपासिन्धु सिव परम अगाधा । प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥
hṛdayam̐ soca samujhata nija karanī | cintā amita jāi nahim̐ baranī ||
kṛpāsindhu siva parama agādhā | pragaṭa na kaheu mora aparādhā ||
5 श्लोक · 58 में से 361
अपनी करनी समझकर सती के मन में अकथनीय चिन्ता हुई। वे सोचती हैं कि कृपासिन्धु शिव ने मेरा अपराध प्रकट रूप से नहीं कहा। शंकर का रुख देखकर भवानी का हृदय व्याकुल हुआ कि प्रभु ने मुझे त्याग दिया। अपना पाप समझकर वे कुछ कह नहीं पातीं, और हृदय कुम्हार के आँवे की तरह भीतर तपता है। सती को चिन्तित जानकर वृषकेतु ने उन्हें सुख देने के लिए मार्ग भर सुन्दर कथाएँ और इतिहास कहे और कैलास पहुँचे। वहाँ अपने प्रण को याद करके वे बरगद के नीचे कमलासन लगाकर बैठे, सहज स्वरूप सँभाला, और अखण्ड समाधि लग गई। दोहा कहता है कि सती भारी शोक के साथ कैलास पर रहीं, भेद कोई न जानता था, और हर दिन युग के समान बीतता था।
हृदयँ सोच समुझत निज करनी । चिन्ता अमित जाइ नहिँ बरनी ॥
कृपासिन्धु सिव परम अगाधा । प्रगट न कहेउ मोर अपराधा ॥
hṛdayam̐ soca samujhata nija karanī | cintā amita jāi nahim̐ baranī ||
kṛpāsindhu siva parama agādhā | pragaṭa na kaheu mora aparādhā ||
सङ्कर-रुख अवलोकि भवानी । प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी ॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई । तपइ अवाँ इव उर अधिकाई ॥
saṅkara-rukha avaloki bhavānī | prabhu mohi tajeu hṛdayam̐ akulānī ||
nija agha samujhi na kachu kahi jāī | tapai avām̐ iva ura adhikāī ||
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू । कहीं कथा सुन्दर सुख-हेतू ॥
बरनत पन्थ बिबिध इतिहासा । बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा ॥
satihi sasoca jāni bṛṣaketū | kahīṃ kathā sundara sukha-hetū ||
baranata pantha bibidha itihāsā | bisvanātha pahum̐ce kailāsā ||
तहँ पुनि समुझि समुझि पन आपन । बैठे बट तर करि कमलासन ॥
सङ्कर सहज-सरूप सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ॥
taham̐ puni samujhi samujhi pana āpana | baiṭhe baṭa tara kari kamalāsana ||
saṅkara sahaja-sarūpa samhārā | lāgi samādhi akhaṃḍa apārā ||
सत्ती बसहि कैलास तब, अधिक सोच मन माहिँ ।
मरम न कोऊ जान कछु, जुग सम दिवस सिराहिं ॥
sattī basahi kailāsa taba, adhika soca mana māhim̐ |
marama na koū jāna kachu, juga sama divasa sirāhiṃ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0