शंकर ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया, और राम का स्मरण करते ही संकल्प हुआ कि इस शरीर से सती से भेंट नहीं होगी। ऐसा विचारकर धीरबुद्धि शिव रघुबीर का स्मरण करते घर चले। आकाशवाणी हुई कि महेश, आपकी जय हो, आपने भक्ति को दृढ़ किया, आपके सिवा ऐसा प्रण कौन करे? यह सुनकर सती ने संकोच से पूछा कि आपने कौन सा प्रण किया है, पर बहुत पूछने पर भी त्रिपुरारि ने नहीं बताया। सोरठों में सती अनुमान करती हैं कि सर्वज्ञ सब जान गए। मैंने शम्भु से कपट किया, स्त्री स्वभाव से जड़ और अज्ञानी होती है। प्रीति दूध और जल की तरह एक होती है, पर कपट की खटाई पड़ते ही दोनों अलग हो जाते हैं और रस चला जाता है।