बालकाण्ड

अध्याय 57: शिव का मौन संकल्प

6 श्लोक · 57 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

शिव का मौन संकल्प

शंकर ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया, और राम का स्मरण करते ही संकल्प हुआ कि इस शरीर से सती से भेंट नहीं होगी। ऐसा विचारकर धीरबुद्धि शिव रघुबीर का स्मरण करते घर चले। आकाशवाणी हुई कि महेश, आपकी जय हो, आपने भक्ति को दृढ़ किया, आपके सिवा ऐसा प्रण कौन करे? यह सुनकर सती ने संकोच से पूछा कि आपने कौन सा प्रण किया है, पर बहुत पूछने पर भी त्रिपुरारि ने नहीं बताया। सोरठों में सती अनुमान करती हैं कि सर्वज्ञ सब जान गए। मैंने शम्भु से कपट किया, स्त्री स्वभाव से जड़ और अज्ञानी होती है। प्रीति दूध और जल की तरह एक होती है, पर कपट की खटाई पड़ते ही दोनों अलग हो जाते हैं और रस चला जाता है।

57.1

तब सङ्कर प्रभु-पद सिर नावा । सुमिरत राम हृदयँ अस आवा ॥
एहिं तन सतिहि भेँट मोहि नाहीँ । सिव सङ्कल्प कीन्ह मन माहीं ॥

taba saṅkara prabhu-pada sira nāvā | sumirata rāma hṛdayam̐ asa āvā ||
ehiṃ tana satihi bhem̐ṭa mohi nāhīm̐ | siva saṅkalpa kīnha mana māhīṃ ||

57.2

अस बिचारि सङ्कर मतिधीरा । चले भवन सुमिरत रघुबीरा ॥
चलत गगन भइ गिरा सुहाई । जय महेस भलि भगति दिढ़ाई ॥

asa bicāri saṅkara matidhīrā | cale bhavana sumirata raghubīrā ||
calata gagana bhai girā suhāī | jaya mahesa bhali bhagati dir̤hāī ||

57.3

अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना । राम भगत समरथ भगवाना ॥
सुनि नभ-गिरा सती उर सोचा । पूछा सिवहि समेत सकोचा ॥

asa pana tumha binu karai ko ānā | rāma bhagata samaratha bhagavānā ||
suni nabha-girā satī ura socā | pūchā sivahi sameta sakocā ||

57.4

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला । सत्य-धाम प्रभु दीनदयाला ॥
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती । तदपि न कहेउ त्रिपुर-आराती ॥

kīnha kavana pana kahahu kṛpālā | satya-dhāma prabhu dīnadayālā ||
jadapi satīṃ pūchā bahu bhām̐tī | tadapi na kaheu tripura-ārātī ||

दो॰ 57 (क)दोहा

सतीं हृदय अनुमान किय, सब जानेउँ सरबज्ञ ।
कीन्ह कपट मैं सम्भु सन, नारि सहज जड़ अज्ञ ॥

satīṃ hṛdaya anumāna kiya, saba jāneum̐ sarabajña |
kīnha kapaṭa maiṃ sambhu sana, nāri sahaja jar̤a ajña ||

57.सो॰ 57 (ख)सोरठा

जल पय सरिस बिकाइ, देखहु प्रीति कि रीति भलि ।
बिलग होत रस जाइ, कपट खटाई परत पुनि ॥

jala paya sarisa bikāi, dekhahu prīti ki rīti bhali |
bilaga hota rasa jāi, kapaṭa khaṭāī parata puni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0