बालकाण्ड

अध्याय 59: सती की राम से देह छूटने की प्रार्थना

5 श्लोक · 59 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सती की राम से देह छूटने की प्रार्थना

सती के हृदय में नित नया शोक है कि दुःख के सागर से कब पार होऊँगी। मैंने रघुपति का अपमान किया और पति के वचन को झूठ जाना, विधाता ने उचित फल दिया। पर विधाता, यह ठीक नहीं कि शंकर से विमुख रखकर भी मुझे जीवित रखो। हृदय की ग्लानि कही नहीं जाती। सयानी सती मन में राम का स्मरण करती हैं। यदि प्रभु दीनदयाल कहलाते हैं, तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाए। यदि शिव के चरणों में मेरा प्रेम मन, कर्म और वचन से सत्य है, तो दोहा कहता है, हे सर्वदर्शी प्रभु, ऐसा उपाय कीजिए कि बिना श्रम मृत्यु हो और यह असह्य विपत्ति दूर हो।

59.1

नित नव सोच सतीं उर भारा । कब जैहउँ दुख-सागर पारा ॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना । पुनि पति-वचन मृषा करि जाना ॥

nita nava soca satīṃ ura bhārā | kaba jaihaum̐ dukha-sāgara pārā ||
maiṃ jo kīnha raghupati apamānā | puni pati-vacana mṛṣā kari jānā ||

59.2

सो फल मोहि बिधाताँ दीन्हा । जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥
अब बिधि अस बूझिअ नहिँ तोही । सङ्कर-बिमुख जिआवसि मोही ॥

so phala mohi bidhātām̐ dīnhā | jo kachu ucita rahā soi kīnhā ||
aba bidhi asa būjhia nahim̐ tohī | saṅkara-bimukha jiāvasi mohī ||

59.3

कहि न जाई कछु हृदय गलानी । मन महँ रामहिँ सुमिरि सयानी ॥
जौँ प्रभु दीनदयाल कहावा । आरति-हरन बेद जस गावा ॥

kahi na jāī kachu hṛdaya galānī | mana maham̐ rāmahim̐ sumiri sayānī ||
jaum̐ prabhu dīnadayāla kahāvā | ārati-harana beda jasa gāvā ||

59.4

तो मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी ॥
जौँ मेरे सिव-चरन सनेहू । मन क्रम बचन सत्य व्रत एहू ॥

to maiṃ binaya karaum̐ kara jorī | chūṭau begi deha yaha morī ||
jaum̐ mere siva-carana sanehū | mana krama bacana satya vrata ehū ||

दो॰ 59दोहा

तौ सबदरसी सुनिय प्रभु, करउ सो बेगि उपाइ ।
होइ मरन जेहि बिनहिँ स्रम, दुसह बिपत्ति बिहाइ ॥

tau sabadarasī suniya prabhu, karau so begi upāi |
hoi marana jehi binahim̐ srama, dusaha bipatti bihāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0