बालकाण्ड

अध्याय 56: सती का छिपाव और शिव का धर्मसंकट

5 श्लोक · 56 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सती का छिपाव और शिव का धर्मसंकट

रघुबीर का प्रभाव समझकर सती ने डर से बात छिपाई। बोलीं, स्वामी, मैंने कोई परीक्षा नहीं ली, आपकी ही तरह प्रणाम किया, आपके वचन पर मुझे पूरा विश्वास है। तब शंकर ने ध्यान में सब जान लिया। उन्होंने राम की माया को सिर नवाया, जिसने सती से झूठ कहलवाया, और विचारा कि हरि की इच्छा और होनी बलवान है। सती ने सीता का वेश धरा, यह जानकर शिव के हृदय में विशेष विषाद हुआ। यदि अब मैं सती से पत्नी रूप में प्रीति करूँ, तो भक्ति का मार्ग मिटेगा और अनीति होगी। दोहा कहता है कि परम प्रेम छोड़ा नहीं जाता और प्रेम करना बड़ा पाप है। महेश कुछ नहीं कहते, पर हृदय का सन्ताप बढ़ता है।

56.1

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ । भय-बस सिव सन कीन्ह दुराऊ ॥
कछु न परीछा लीन्हि गोसाँई । कीन्ह प्रनाम तुम्हारिहि नाँई ॥

satīṃ samujhi raghubīra prabhāū | bhaya-basa siva sana kīnha durāū ||
kachu na parīchā līnhi gosām̐ī | kīnha pranāma tumhārihi nām̐ī ||

56.2

जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई । मोरें मन प्रतीति अति सोई ॥
तब सङ्कर देखेउ धरि ध्याना । सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना ॥

jo tumha kahā so mṛṣā na hoī | moreṃ mana pratīti ati soī ||
taba saṅkara dekheu dhari dhyānā | satīṃ jo kīnha carita saba jānā ||

56.3

बहुरि राम-मायहि सिर नावा । प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा ॥
हरि-इच्छा भावी बलवाना । हृदयँ बिचारत सम्भु सुजाना ॥

bahuri rāma-māyahi sira nāvā | preri satihi jehiṃ jhūṭha kahāvā ||
hari-icchā bhāvī balavānā | hṛdayam̐ bicārata sambhu sujānā ||

56.4

सतीं कीन्ह सीता कर वेषा । सिव-उर भयउ बिषाद बिसेषा ॥
जौँ अब करउँ सती सन प्रीती । मिटइ भगति-पथ होइ अनीती ॥

satīṃ kīnha sītā kara veṣā | siva-ura bhayau biṣāda biseṣā ||
jaum̐ aba karaum̐ satī sana prītī | miṭai bhagati-patha hoi anītī ||

दो॰ 56दोहा

परम-पुनीत न जाइ तजि, जाइ किये प्रेम बड़ पाप ।
प्रगटि न कहत महेस कछु, हृदयँ अधिक सन्ताप ॥

parama-punīta na jāi taji, jāi kiye prema bar̤a pāpa |
pragaṭi na kahata mahesa kachu, hṛdayam̐ adhika santāpa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0