महेश बोले, यदि मन में इतना सन्देह है तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं? जब तक तुम लौटोगी, मैं इस बरगद की छाया में बैठा हूँ। जिससे मोह मिटे, विवेक से वही यत्न करना। आज्ञा पाकर सती चलीं और सोचने लगीं कि क्या करूँ। इधर शम्भु ने अनुमान किया कि दक्षकुमारी का कल्याण नहीं है। मेरे कहने से भी संशय नहीं गया, विधाता उलटा हो तो भलाई नहीं होती। जो राम ने रचा है वही होगा, तर्क करके कौन शाखा बढ़ाए। यह कहकर वे हरिनाम जपने लगे। दोहा कहता है कि बार बार विचार करके सती ने सीता का रूप धरा और उस मार्ग पर आगे चलीं जिससे नरभूप राम आ रहे थे।