बालकाण्ड

अध्याय 52: सती राम की परीक्षा लेने चलीं

5 श्लोक · 52 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सती राम की परीक्षा लेने चलीं

महेश बोले, यदि मन में इतना सन्देह है तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं? जब तक तुम लौटोगी, मैं इस बरगद की छाया में बैठा हूँ। जिससे मोह मिटे, विवेक से वही यत्न करना। आज्ञा पाकर सती चलीं और सोचने लगीं कि क्या करूँ। इधर शम्भु ने अनुमान किया कि दक्षकुमारी का कल्याण नहीं है। मेरे कहने से भी संशय नहीं गया, विधाता उलटा हो तो भलाई नहीं होती। जो राम ने रचा है वही होगा, तर्क करके कौन शाखा बढ़ाए। यह कहकर वे हरिनाम जपने लगे। दोहा कहता है कि बार बार विचार करके सती ने सीता का रूप धरा और उस मार्ग पर आगे चलीं जिससे नरभूप राम आ रहे थे।

52.1

जौँ तुम्हरें मन अति सन्देहू । तौ किन जाइ परीछा लेहू ॥
तब लगि बैठ अहउँ बट छाहीँ । जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं ॥

jaum̐ tumhareṃ mana ati sandehū | tau kina jāi parīchā lehū ||
taba lagi baiṭha ahaum̐ baṭa chāhīm̐ | jaba lagi tumha aihahu mohi pāhīṃ ||

52.2

जैसें जाइ मोह-भ्रम-भारी । करेहु सो जतन बिबेक बिचारी ॥
चलीँ सती सिव आयसु पाई । करइ विचार करउँ का भाई ॥

jaiseṃ jāi moha-bhrama-bhārī | karehu so jatana bibeka bicārī ||
calīm̐ satī siva āyasu pāī | karai vicāra karaum̐ kā bhāī ||

52.3

इहाँ सम्भु अस मन अनुमाना । दच्छसुता कहुँ नहिँ कल्याना ॥
मोरेहु कहें न संसय जाहीं । बिधि बिपरीत भलाई नाहीं ॥

ihām̐ sambhu asa mana anumānā | dacchasutā kahum̐ nahim̐ kalyānā ||
morehu kaheṃ na saṃsaya jāhīṃ | bidhi biparīta bhalāī nāhīṃ ||

52.4

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तरक बढ़ावै साखा ॥
अस कहि लगे जपन लगे हरि-नामा । गई सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

hoihi soi jo rāma raci rākhā | ko kari taraka bar̤hāvai sākhā ||
asa kahi lage japana lage hari-nāmā | gaī satī jaham̐ prabhu sukhadhāmā ||

दो॰ 52दोहा

पुनि पुनि हृदयँ बिचार करि, धरि सीता कर रूप ।
आगें होइ चलि पन्थ तेहि, जेहिं आवत नर-भूप ॥

puni puni hṛdayam̐ bicāra kari, dhari sītā kara rūpa |
āgeṃ hoi cali pantha tehi, jehiṃ āvata nara-bhūpa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0