बिष्नु जो सुर-हित नर-तनु-धारी । सोउ सरबज्ञ जथा त्रिपुरारी ॥
खोजइ सो कि अज्ञ इव नारी । ज्ञान-धाम श्रीपति असुरारी ॥
biṣnu jo sura-hita nara-tanu-dhārī | sou sarabajña jathā tripurārī ||
khojai so ki ajña iva nārī | jñāna-dhāma śrīpati asurārī ||
6 श्लोक · 51 में से 361
सती आगे सोचती हैं कि मनुष्य रूप में विष्णु भी सर्वज्ञ होंगे, तो क्या लक्ष्मीपति अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे? पर शम्भु की वाणी भी झूठी नहीं हो सकती। उनके मन में अपार संशय हुआ। उन्होंने कुछ कहा नहीं, पर अन्तर्यामी हर सब जान गए। वे बोले, सती, अपने स्त्री स्वभाव से ऐसा संशय मन में न रखो। जिनकी कथा अगस्त्य ने गाई, वही मेरे इष्टदेव रघुबीर हैं। छन्द कहता है कि जिनका योगी ध्यान करते हैं और वेद नेति कहकर गाते हैं, वही व्यापक ब्रह्म, माया के स्वामी राम भक्तों के लिए रघुकुलमणि बनकर अवतरे हैं। सोरठा कहता है कि उपदेश सती के मन में न बैठा, और हरि की माया का बल जानकर महेश मुस्कुराए।
बिष्नु जो सुर-हित नर-तनु-धारी । सोउ सरबज्ञ जथा त्रिपुरारी ॥
खोजइ सो कि अज्ञ इव नारी । ज्ञान-धाम श्रीपति असुरारी ॥
biṣnu jo sura-hita nara-tanu-dhārī | sou sarabajña jathā tripurārī ||
khojai so ki ajña iva nārī | jñāna-dhāma śrīpati asurārī ||
सम्भु गिरा पुनि मृषा न होई । सिव सरबज्ञ जान सब कोई ॥
अस संसय मन भयउ अपारा । होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा ॥
sambhu girā puni mṛṣā na hoī | siva sarabajña jāna saba koī ||
asa saṃsaya mana bhayau apārā | hoi na hṛdayam̐ prabodha pracārā ||
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी । हर अन्तरजामी सब जानी ॥
सुनहु सती तव नारि सुभाऊ । संसय अस न धरिय उर काऊ ॥
jadyapi pragaṭa na kaheu bhavānī | hara antarajāmī saba jānī ||
sunahu satī tava nāri subhāū | saṃsaya asa na dhariya ura kāū ||
जासु कथा कुम्भज रिषि गाई । भगति जासु मैं मुनिहिँ सुनाई ॥
सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा । सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥
jāsu kathā kumbhaja riṣi gāī | bhagati jāsu maiṃ munihim̐ sunāī ||
soi mama iṣṭadeva raghubīrā | sevata jāhi sadā muni dhīrā ||
मुनि धीर जोगी सिद्ध सन्तत, बिमल मन जेहि ध्यावहीं ।
कहि नेति निगम पुरान आगम, जासु कीरति गावहीं ॥
सोइ राम व्यापक ब्रह्म भुवन-निकाय-पति माया धनी ।
अवतरेउ अपने भगत-हित निजतन्त्र नित रघुकुल-मनी ॥
muni dhīra jogī siddha santata, bimala mana jehi dhyāvahīṃ |
kahi neti nigama purāna āgama, jāsu kīrati gāvahīṃ ||
soi rāma vyāpaka brahma bhuvana-nikāya-pati māyā dhanī |
avatareu apane bhagata-hita nijatantra nita raghukula-manī ||
लाग न उर उपदेस, जदपि कहेउ सिवँ बार बहु ।
बोले बिहँसि महेस, हरि-माया-बल जानि जियँ ॥
lāga na ura upadesa, jadapi kaheu sivam̐ bāra bahu |
bole biham̐si mahesa, hari-māyā-bala jāni jiyam̐ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0