बालकाण्ड

अध्याय 50: शिव का प्रणाम और सती का सन्देह

5 श्लोक · 50 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

शिव का प्रणाम और सती का सन्देह

उसी समय शम्भु ने राम को देखा और हृदय में विशेष आनन्द उमड़ा। उन्होंने छवि के समुद्र को नेत्र भरकर देखा, पर कुसमय जानकर परिचय नहीं दिया। जगत को पवित्र करने वाले सच्चिदानन्द की जय हो, यह कहकर वे सती के साथ चल पड़े और बार बार पुलकित होते रहे। यह देखकर सती के मन में बड़ा सन्देह उठा। शंकर जगदीश हैं, जिन्हें देवता और मुनि सिर नवाते हैं, फिर भी उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानन्द और परमधाम कहकर प्रणाम किया और अब भी प्रेम रोक नहीं पाते। दोहे में उनका तर्क है: जो ब्रह्म सर्वव्यापक, निर्मल, अजन्मा और भेदरहित है, जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धरकर मनुष्य हो सकता है?

50.1

सम्भु समय तेहि रामहिँ देखा । उपजा हियँ अति हरष बिसेखा ॥
भरि लोचन छबिसिन्धु निहारी । कुसमय जानि न कीन्ह चिन्हारी ॥

sambhu samaya tehi rāmahim̐ dekhā | upajā hiyam̐ ati haraṣa bisekhā ||
bhari locana chabisindhu nihārī | kusamaya jāni na kīnha cinhārī ||

50.2

जय सच्चिदानन्द जग-पावन । अस कहि चलेउ मनोज-नसावन ॥
चले जात सिव सती-समेता । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥

jaya saccidānanda jaga-pāvana | asa kahi caleu manoja-nasāvana ||
cale jāta siva satī-sametā | puni puni pulakata kṛpāniketā ||

50.3

सतीं सो दसा सम्भु कै देखी । उर उपजा सन्देह बिसेखी ॥
सङ्कर जगतबंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावहिँ सीसा ॥

satīṃ so dasā sambhu kai dekhī | ura upajā sandeha bisekhī ||
saṅkara jagatabaṃdya jagadīsā | sura nara muni saba nāvahim̐ sīsā ||

50.4

तिन्ह नृप-सुतहि कीन्ह परनामा । कहि सच्चिदानन्द परधामा ॥
भये मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी ॥

tinha nṛpa-sutahi kīnha paranāmā | kahi saccidānanda paradhāmā ||
bhaye magana chabi tāsu bilokī | ajahum̐ prīti ura rahati na rokī ||

दो॰ 50दोहा

ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज, अकल अनीह अभेद ।
सो कि देह धरि होइ नर, जाहि न जानत बेद ॥

brahma jo byāpaka biraja aja, akala anīha abheda |
so ki deha dhari hoi nara, jāhi na jānata beda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0