चारि सिंहासन सहज सुहाये । जनु मनोज निज हाथ बनाये ॥
तिन्ह पर कुँअरि कुअँर बैठारे । सादर पाय पुनीत पखारे ॥
cāri siṃhāsana sahaja suhāye | janu manoja nija hātha banāye ||
tinha para kum̐ari kuam̐ra baiṭhāre | sādara pāya punīta pakhāre ||
6 श्लोक · 350 में से 361
चार सुहावने सिंहासन रखे जाते हैं, मानो कामदेव ने अपने हाथों बनाए हों, और उन पर कुमार और कुमारियाँ बैठाए जाते हैं। माताएँ आदर से उनके पवित्र चरण पखारती हैं और वेदविधि से धूप, दीप और नैवेद्य से जोड़ियों का पूजन करती हैं। सिर पर चँवर डुलते हैं। माताएँ ऐसी आनंदित हैं मानो योगी ने परम तत्व पा लिया हो, सदा के रोगी को अमृत मिला हो, जन्म के दरिद्र को पारस, अंधे को आँखें, गूँगे के मुख में सरस्वती आ बसी हो, या शूरवीर ने युद्ध जीत लिया हो। इससे सौ करोड़ गुना आनंद उन्हें है, क्योंकि रघुकुल के चंद्र भाइयों सहित ब्याह कर घर आए हैं। माताएँ लोकरीतियाँ करती हैं, दुलहिनें सकुचाती हैं, और यह विनोद देखकर श्रीराम मन ही मन मुसकाते हैं।
चारि सिंहासन सहज सुहाये । जनु मनोज निज हाथ बनाये ॥
तिन्ह पर कुँअरि कुअँर बैठारे । सादर पाय पुनीत पखारे ॥
cāri siṃhāsana sahaja suhāye | janu manoja nija hātha banāye ||
tinha para kum̐ari kuam̐ra baiṭhāre | sādara pāya punīta pakhāre ||
धूप दीप नैवेद बेद-बिधि । पूजे बर-दुलहिनि मंगलनिधि ॥
बारहिं बार आरती करहीँ । व्यजन चारु चामर सिर ढरहीं ॥
dhūpa dīpa naiveda beda-bidhi | pūje bara-dulahini maṃgalanidhi ||
bārahiṃ bāra āratī karahīm̐ | vyajana cāru cāmara sira ḍharahīṃ ||
बस्तु अनेक निछावर होहीँ । भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं ॥
पावा परम-तत्व जनु जोगीं । अमृत लहेउ जनु सन्तत रोगीं ॥
bastu aneka nichāvara hohīm̐ | bharīṃ pramoda mātu saba sohīṃ ||
pāvā parama-tatva janu jogīṃ | amṛta laheu janu santata rogīṃ ||
जनम-रङ्क जनु पारस पावा । अन्धहि लोचन लाभ सुहावा ॥
मूक-बदन जनु सारद छाई । मानहुँ, समर सूर जय पाई ॥
janama-raṅka janu pārasa pāvā | andhahi locana lābha suhāvā ||
mūka-badana janu sārada chāī | mānahum̐, samara sūra jaya pāī ||
एहि सुख त सतकोटि-गुन, पावहिं मातु अनन्द ।
भाइन्ह सहित बिआहि घर, आये रघुकुल-चन्द ॥
ehi sukha ta satakoṭi-guna, pāvahiṃ mātu ananda |
bhāinha sahita biāhi ghara, āye raghukula-canda ||
लोक-रीति जननी करहिँ, घर दुलहिनि सकुचाहिँ ।
मोद बिनोद बिलोकि बड़, राम मनहिँ मुसुकाहिँ ॥
loka-rīti jananī karahim̐, ghara dulahini sakucāhim̐ |
moda binoda biloki bar̤a, rāma manahim̐ musukāhim̐ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0