बालकाण्ड

अध्याय 347: सावन की घटा सा श्रीराम का पुरप्रवेश

5 श्लोक · 347 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सावन की घटा सा श्रीराम का पुरप्रवेश

तुलसीदास पुरप्रवेश को वर्षा ऋतु के रूप में दिखाते हैं। धूप के धुएँ से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन की घटा घिर आई हो। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसाते हैं, जो बगुलों की पाँत जैसी लगती हैं। मणियों के बंदनवार इंद्रधनुष जैसे हैं। अटारियों पर स्त्रियाँ प्रकट होती और छिपती हैं, जैसे चंचल बिजली चमकती हो। नगाड़ों की ध्वनि मेघ का गर्जन है, और याचक चातक, मेंढक और मोर हैं। देवता सुगंधित जल बरसाते हैं। समय जानकर गुरु आज्ञा देते हैं और रघुकुलमणि नगर में प्रवेश करते हैं। शंभु, गिरिजा और गणेश का स्मरण करके राजा समाज सहित प्रसन्न मन से चलते हैं। शकुन होते हैं, देवता नगाड़े बजाकर फूल बरसाते हैं, और देवांगनाएँ मंगल गाती हुई नाचती हैं।

347.1

धूप-धूम नभ मेचक भयऊ । सावन घन-घमंड जनु ठयऊ ॥
सुरतरु-सुमन-माल सुर बरषहिँ । मनहुँ बलाक-अवलि मन करषहिं ॥

dhūpa-dhūma nabha mecaka bhayaū | sāvana ghana-ghamaṃḍa janu ṭhayaū ||
surataru-sumana-māla sura baraṣahim̐ | manahum̐ balāka-avali mana karaṣahiṃ ||

347.2

मञ्जुल मनिमय बंदनिवारे । मनहुँ पाकरिपु-चाप सँवारे ॥
प्रगटहिँ दुरहिँ अटन्ह पर भामिनि । चारु चपल जनु दमकहिँ दामिनि ॥

mañjula manimaya baṃdanivāre | manahum̐ pākaripu-cāpa sam̐vāre ||
pragaṭahim̐ durahim̐ aṭanha para bhāmini | cāru capala janu damakahim̐ dāmini ||

347.3

दुन्दुभि-धुनि घन-गरजनि घोरा । जाचक चातक-दादुर-मोरा ॥
सुर सुगन्ध सुचि बरषहिँ बारी । सुखी सकल ससि पुर नर नारी ॥

dundubhi-dhuni ghana-garajani ghorā | jācaka cātaka-dādura-morā ||
sura sugandha suci baraṣahim̐ bārī | sukhī sakala sasi pura nara nārī ||

347.4

समय जानि गुरु आयसु दीन्हा । पुर प्रबेस रघुकुल-मनि कीन्हा ॥
सुमिरि सम्भु-गिरिजा-गनराजा । मुदित महीपति सहित समाजा ॥

samaya jāni guru āyasu dīnhā | pura prabesa raghukula-mani kīnhā ||
sumiri sambhu-girijā-ganarājā | mudita mahīpati sahita samājā ||

दो॰ 347दोहा

होहिँ सगुन बरषहिँ सुमन, सुर दुंदुभीं बजाइ ।
बिबुध-बधू नाचहिँ मुदित, मञ्जुल मङ्गल गाई ॥

hohim̐ saguna baraṣahim̐ sumana, sura duṃdubhīṃ bajāi |
bibudha-badhū nācahim̐ mudita, mañjula maṅgala gāī ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0