जनक सनेह सील करतूती । नृपु सब राति सराहत बीती ॥
दिन उठि बिदा अवधपति माँगा । राखहिँ जनक सहित अनुरागा ॥
janaka saneha sīla karatūtī | nṛpu saba rāti sarāhata bītī ||
dina uṭhi bidā avadhapati mām̐gā | rākhahim̐ janaka sahita anurāgā ||
5 श्लोक · 332 में से 361
दशरथ की रातें जनक के स्नेह, शील और करनी की सराहना करते बीत जाती हैं। हर सुबह वे विदा माँगते हैं और जनक प्रेम से उन्हें रोक लेते हैं। नित्य आदर बढ़ता है, हर दिन हजार प्रकार की पहुनाई होती है, नगर में नया उत्सव रहता है, और दशरथ का जाना किसी को नहीं सुहाता। इस प्रकार बहुत दिन बीत जाते हैं, मानो बाराती स्नेह की रस्सी से बँधे हों। तब विश्वामित्र और शतानंद जाकर जनक को समझाते हैं कि यद्यपि आप स्नेह नहीं छोड़ सकते, फिर भी अब दशरथ को आज्ञा दीजिए। जनक मान लेते हैं और मंत्रियों को बुलाते हैं। जनक कहते हैं कि अवधनाथ जाना चाहते हैं, भीतर रनिवास में सूचना दो। यह सुनकर मंत्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा सब प्रेम में डूब जाते हैं।
जनक सनेह सील करतूती । नृपु सब राति सराहत बीती ॥
दिन उठि बिदा अवधपति माँगा । राखहिँ जनक सहित अनुरागा ॥
janaka saneha sīla karatūtī | nṛpu saba rāti sarāhata bītī ||
dina uṭhi bidā avadhapati mām̐gā | rākhahim̐ janaka sahita anurāgā ||
नित नूतन आदर अधिकाई । दिन प्रति सहस-भाँति पहुनाई ॥
नित नव नगर अनन्द उछाहू । दसरथ गवन सोहाइ न काहू ॥
nita nūtana ādara adhikāī | dina prati sahasa-bhām̐ti pahunāī ||
nita nava nagara ananda uchāhū | dasaratha gavana sohāi na kāhū ||
बहुत दिवस बीते एहि भाँती । जनु सनेह रजु बँधे बराती ॥
कौसिक सतानन्द तब जाई । कहा बिदेह नृपहि समुझाई ॥
bahuta divasa bīte ehi bhām̐tī | janu saneha raju bam̐dhe barātī ||
kausika satānanda taba jāī | kahā bideha nṛpahi samujhāī ||
अब दसरथ कहँ आयसु देहू । जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू ॥
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाये । कहि जय जीव सीस तिन्ह नाये ॥
aba dasaratha kaham̐ āyasu dehū | jadyapi chār̤i na sakahu sanehū ||
bhalehiṃ nātha kahi saciva bolāye | kahi jaya jīva sīsa tinha nāye ||
अवधनाथ चाहत चलन, भीतर करहु जनाउ ।
भये प्रेम-बस सचिव सुनि, विप्र सभासद राउ ॥
avadhanātha cāhata calana, bhītara karahu janāu |
bhaye prema-basa saciva suni, vipra sabhāsada rāu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0