दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे । पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे ॥
चारि लच्छ बर-धेनु मगाई । कामसुरभि सम सील सुहाई ॥
daṃḍa pranāma sabahi nṛpa kīnhe | pūji saprema barāsana dīnhe ||
cāri laccha bara-dhenu magāī | kāmasurabhi sama sīla suhāī ||
5 श्लोक · 331 में से 361
दशरथ सब मुनियों को दंडवत प्रणाम करते हैं, प्रेम से पूजकर उत्तम आसन देते हैं। वे कामधेनु जैसी सीधी चार लाख श्रेष्ठ गौएँ मँगवाते हैं, उन्हें सब प्रकार सजाकर प्रसन्न मन से ब्राह्मणों को दान देते हैं और विनती करते हैं कि आज मैंने संसार में जीने का लाभ पा लिया। आशीर्वाद पाकर वे याचकों को बुलाते हैं और रुचि पूछ पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़े, हाथी और रथ देते हैं। याचक सूर्यकुल के स्वामी की जय गाते हुए चले जाते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि राम विवाह का उत्सव हजार मुख वाले शेष भी नहीं कह सकते। राजा बार बार विश्वामित्र के चरणों में सिर नवाकर कहते हैं कि हे मुनिराज, यह सब सुख आपकी कृपादृष्टि का प्रभाव है।
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे । पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे ॥
चारि लच्छ बर-धेनु मगाई । कामसुरभि सम सील सुहाई ॥
daṃḍa pranāma sabahi nṛpa kīnhe | pūji saprema barāsana dīnhe ||
cāri laccha bara-dhenu magāī | kāmasurabhi sama sīla suhāī ||
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीँ । मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीँ ॥
करत बिनय बहु बिधि नरनाहू । लहेउँ आजु जग जीवन-लाहू ॥
saba bidhi sakala alaṃkṛta kīnhīm̐ | mudita mahipa mahidevanha dīnhīm̐ ||
karata binaya bahu bidhi naranāhū | laheum̐ āju jaga jīvana-lāhū ||
पाइ असीस महीस अनन्दा । लिये बोलि पुनि जाचक-बृन्दा ॥
कनक बसन मनि हय गय स्यन्दन । दिये बूझिरुचि रविकुल-नन्दन ॥
pāi asīsa mahīsa anandā | liye boli puni jācaka-bṛndā ||
kanaka basana mani haya gaya syandana | diye būjhiruci ravikula-nandana ||
चले पढ़त गावत गुन गाथा । जय जय जय दिनकर-कुल-नाथा ॥
एहि विधि राम-बिबाह-उछाहू । सकइ न बरनि सहस-मुख जाहू ॥
cale par̤hata gāvata guna gāthā | jaya jaya jaya dinakara-kula-nāthā ||
ehi vidhi rāma-bibāha-uchāhū | sakai na barani sahasa-mukha jāhū ||
बार बार कौसिक चरन, सीस नाइ कह राउ ।
यह सब सुखं मुनिराज तव, कृपा-कटाच्छ प्रभाउ ॥
bāra bāra kausika carana, sīsa nāi kaha rāu |
yaha saba sukhaṃ munirāja tava, kṛpā-kaṭāccha prabhāu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0