नित नूतन मङ्गल पुर माहीं । निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीँ ॥
बड़े भोर भूपतिमनि जागे । जाचक गुन गन गावन लागे ॥
nita nūtana maṅgala pura māhīṃ | nimiṣa sarisa dina jāmini jāhīm̐ ||
bar̤e bhora bhūpatimani jāge | jācaka guna gana gāvana lāge ||
5 श्लोक · 330 में से 361
जनकपुर में नित्य नए मंगल हो रहे हैं और दिन रात पलक झपकते बीत जाते हैं। एक दिन बड़े भोर राजाओं में मणि दशरथ जागते हैं और याचक उनके गुण गाने लगते हैं। बहुओं सहित पुत्रों को देखकर उनके मन में जो आनंद है, वह कहा नहीं जा सकता। प्रातःकर्म करके वे गुरु के पास जाते हैं और प्रणाम व पूजा करके हाथ जोड़कर अमृत में डूबी सी वाणी बोलते हैं: हे मुनिराज, आपकी कृपा से आज मैं पूर्णकाम हो गया। अब हे स्वामी, सब ब्राह्मणों को बुलाकर सब प्रकार सजी हुई गौएँ दान कीजिए। यह सुनकर गुरु राजा की बड़ाई करते हैं और मुनियों को बुलवाते हैं। तब वामदेव, देवर्षि, वाल्मीकि, जाबालि, विश्वामित्र आदि अनेक तपस्वी मुनिश्रेष्ठ आ जाते हैं।
नित नूतन मङ्गल पुर माहीं । निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीँ ॥
बड़े भोर भूपतिमनि जागे । जाचक गुन गन गावन लागे ॥
nita nūtana maṅgala pura māhīṃ | nimiṣa sarisa dina jāmini jāhīm̐ ||
bar̤e bhora bhūpatimani jāge | jācaka guna gana gāvana lāge ||
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता । किमि कहि जात मोदु मन जेता ॥
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीँ । महा प्रमोद प्रेम मन माहीं ॥
dekhi kuam̐ra bara badhunha sametā | kimi kahi jāta modu mana jetā ||
prātakriyā kari ge guru pāhīm̐ | mahā pramoda prema mana māhīṃ ||
करि प्रनाम पूजा कर जोरी । बोले गिरा अमिय जनु बोरी ॥
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा । भयउँ आजु मैं पूरनकाजा ॥
kari pranāma pūjā kara jorī | bole girā amiya janu borī ||
tumharī kṛpām̐ sunahu munirājā | bhayaum̐ āju maiṃ pūranakājā ||
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाँई । देहु धेनु सब भाँति बनाई ॥
सुनि गुरु करि महिपाल बड़ाई । पुनि पठये मुनि बृन्द बोलाई ॥
aba saba bipra bolāi gosām̐ī | dehu dhenu saba bhām̐ti banāī ||
suni guru kari mahipāla bar̤āī | puni paṭhaye muni bṛnda bolāī ||
बामदेव अरु देवरिषि, बालमीकि जाबालि ।
आये मुनिबर निकर तब, कौसिकादि तप-सालि ॥
bāmadeva aru devariṣi, bālamīki jābāli |
āye munibara nikara taba, kausikādi tapa-sāli ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0