कीन्ह प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि विधि सङ्कर कहा बखानी ॥
सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथा प्रबन्ध विचित्र बनाई ॥
kīnha prasna jehi bhām̐ti bhavānī | jehi vidhi saṅkara kahā bakhānī ||
so saba hetu kahaba maiṃ gāī | kathā prabandha vicitra banāī ||
5 श्लोक · 33 में से 361
तुलसीदास कहते हैं कि भवानी ने जैसे प्रश्न किए और शंकर ने जैसे विस्तार से उत्तर दिया, वह सब कारण सहित वे एक विचित्र कथा प्रबन्ध में गाएँगे। जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह अचरज न करे। ज्ञानी अचरज नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि रामकथा की कोई सीमा नहीं। राम के अवतार अनेक प्रकार के हैं और रामायण सौ करोड़। अलग अलग कल्पों में मुनियों ने हरिचरित अलग अलग गाए हैं। इसलिए संशय न करके आदर और प्रेम से कथा सुननी चाहिए। दोहा कहता है कि राम अनन्त हैं, उनके गुण अनन्त हैं और कथा असीम है, निर्मल विचार वाले अचरज नहीं मानेंगे।
कीन्ह प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि विधि सङ्कर कहा बखानी ॥
सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथा प्रबन्ध विचित्र बनाई ॥
kīnha prasna jehi bhām̐ti bhavānī | jehi vidhi saṅkara kahā bakhānī ||
so saba hetu kahaba maiṃ gāī | kathā prabandha vicitra banāī ||
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरज करइ सुनि सोई ॥
कथा अलौकिक सुनहिँ जे ज्ञानी । नहिँ आचरज करहिं अस जानी ॥
jehi yaha kathā sunī nahiṃ hoī | jani ācaraja karai suni soī ||
kathā alaukika sunahim̐ je jñānī | nahim̐ ācaraja karahiṃ asa jānī ||
राम कथाकै मिति जग नाहीँ । अस प्रतीति तिन्ह के मन माहीँ ॥
नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥
rāma kathākai miti jaga nāhīm̐ | asa pratīti tinha ke mana māhīm̐ ||
nānā bhām̐ti rāma avatārā | rāmāyana sata koṭi apārā ||
कलपभेद हरिचरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाये ॥
करिय न संसय अस उर आनी । सुनिय कथा सादर रति मानी ॥
kalapabheda haricarita suhāye | bhām̐ti aneka munīsanha gāye ||
kariya na saṃsaya asa ura ānī | suniya kathā sādara rati mānī ||
राम अनन्त अनन्त गुन, अमित कथा विस्तार ।
सुनि आचरज न मानिहहिँ, जिन्ह कें बिमल विचार ॥
rāma ananta ananta guna, amita kathā vistāra |
suni ācaraja na mānihahim̐, jinha keṃ bimala vicāra ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0