बालकाण्ड

अध्याय 324: जनक ने चरण पखारे, सीता का कन्यादान

9 श्लोक · 324 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

जनक ने चरण पखारे, सीता का कन्यादान

जनक की पटरानी सुनयना बुलाई जाती हैं और वे जनक के बाएँ ऐसे शोभती हैं जैसे हिमाचल के साथ मैना। राजा रानी जल के सोने के कलश श्रीराम के आगे रखते हैं, और वेदपाठ व पुष्पवर्षा के बीच प्रेम से पुलकित होकर प्रभु के चरण पखारते हैं। तुलसीदास उन चरणों की महिमा कहते हैं: वे शिव के हृदय में बसते हैं, उनके स्मरण से कलियुग के मल भागते हैं, उनके स्पर्श से अहल्या को गति मिली, और उनका जल शिव सिर पर धरते हैं। कुलगुरु शाखोच्चार करते हैं, पाणिग्रहण होता है, और जैसे हिमवान ने गिरिजा महेश को और सागर ने लक्ष्मी हरि को दी, वैसे ही जनक सीता को श्रीराम को सौंपते हैं। होम के बाद गाँठ जुड़ती है और भाँवरें आरंभ होती हैं।

324.1

जनक-पाटमहिषी जग जानी । सीय मातु किमि जाइ बखानी ॥
सुजस सुकृत सुख सुन्दरताई । सब समेटि विधि रची बनाई ॥

janaka-pāṭamahiṣī jaga jānī | sīya mātu kimi jāi bakhānī ||
sujasa sukṛta sukha sundaratāī | saba sameṭi vidhi racī banāī ||

324.2

समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई । सुनत सुआसिनि सादर ल्याई ॥
जनक बाम-दिसि सोह सुनयना । हिम-गिरि सङ्ग बनी जनु मयना ॥

samau jāni munibaranha bolāī | sunata suāsini sādara lyāī ||
janaka bāma-disi soha sunayanā | hima-giri saṅga banī janu mayanā ||

324.3

कनक-कलस मनि-कोपर रूरे । सुचि-सुगन्ध-मङ्गल-जल पूरे ॥
निज कर मुदित रायँ अरु रानी । धरे राम के आगें आनी ॥

kanaka-kalasa mani-kopara rūre | suci-sugandha-maṅgala-jala pūre ||
nija kara mudita rāyam̐ aru rānī | dhare rāma ke āgeṃ ānī ||

324.4

पढ़हिँ बेद मुनि मङ्गल बानी । गगन सुमन झरि अवसरु जानी ॥
बर बिलोकि दम्पति अनुरागे । पाय पुनीत पखारन लागे ॥

par̤hahim̐ beda muni maṅgala bānī | gagana sumana jhari avasaru jānī ||
bara biloki dampati anurāge | pāya punīta pakhārana lāge ||

324.छं॰ 1छन्द

लागे पखारन पाय-पङ्कज, प्रेम तनु पुलकावली ।
नभ नगर गान-निसान-जय धुनि, उमगि जनु चहुँ दिसि चली ॥
जे पद-सरोज मनोज अरि उर,-सर सदैव बिराजहीं ।
जे सकृत सुमिरत बिमलता मन, सकल कलि मल भाजहीं ॥

lāge pakhārana pāya-paṅkaja, prema tanu pulakāvalī |
nabha nagara gāna-nisāna-jaya dhuni, umagi janu cahum̐ disi calī ||
je pada-saroja manoja ari ura,-sara sadaiva birājahīṃ |
je sakṛta sumirata bimalatā mana, sakala kali mala bhājahīṃ ||

324.छं॰ 2छन्द

जे परसि मुनि-बनिता लही गति, रही जो पातक-मई ।
मकरन्द जिन्ह को सम्भु सिर सुचिता, अवधि सुर बरनई ॥
करि मधुप मन मुनि मन जोगि-जन जे, सेइ अभिमत गति लहैं ।
ते पद पखारत भाग्य-भाजन, जनक जय जय सब कहै ॥

je parasi muni-banitā lahī gati, rahī jo pātaka-maī |
makaranda jinha ko sambhu sira sucitā, avadhi sura baranaī ||
kari madhupa mana muni mana jogi-jana je, sei abhimata gati lahaiṃ |
te pada pakhārata bhāgya-bhājana, janaka jaya jaya saba kahai ||

324.छं॰ 3छन्द

बर-कुँअरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं ।
भयो पानि-गहन बिलोकि बिधि-सुर-मनुज-मुनि आनँद भएँ ॥
सुख-मूल-दूलह देखि दम्पति, पुलक तनु हुलस्यो हियो ।
करि लोक-बेद-विधान कन्यादान नृप-भूषन किया ॥

bara-kum̐ari karatala jori sākhocāru dou kulagura karaiṃ |
bhayo pāni-gahana biloki bidhi-sura-manuja-muni ānam̐da bhaem̐ ||
sukha-mūla-dūlaha dekhi dampati, pulaka tanu hulasyo hiyo |
kari loka-beda-vidhāna kanyādāna nṛpa-bhūṣana kiyā ||

324.छं॰ 4छन्द

हिमवन्त जिमि गिरिजा महेसहि, हरिहि श्री सागर दई ।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी, बिस्व कल कीरति नई ॥
क्यों करइ बिनय बिदेह कियो बिदेह मूरति सावँरी ।
करि होम बिधिवत गाँठि जोरी, होन लागी भावँरी ॥

himavanta jimi girijā mahesahi, harihi śrī sāgara daī |
timi janaka rāmahi siya samarapī, bisva kala kīrati naī ||
kyoṃ karai binaya bideha kiyo bideha mūrati sāvam̐rī |
kari homa bidhivata gām̐ṭhi jorī, hona lāgī bhāvam̐rī ||

दो॰ 324दोहा

जय-धुनि बन्दी-बेद-धुनि, मङ्गल-गान निसान ।
सुनि हरषहिँ बरषहिँ बिबुध, सुरतरु-सुमन सुजान ॥

jaya-dhuni bandī-beda-dhuni, maṅgala-gāna nisāna |
suni haraṣahim̐ baraṣahim̐ bibudha, surataru-sumana sujāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0