सिय सुन्दरता बरनि न जाई । लघु मति बहुत मनोहरताई ॥
आवत दीखि बरातिन्ह सीता । रूप-रासि सब भाँति पुनीता ॥
siya sundaratā barani na jāī | laghu mati bahuta manoharatāī ||
āvata dīkhi barātinha sītā | rūpa-rāsi saba bhām̐ti punītā ||
7 श्लोक · 323 में से 361
सीता की सुंदरता का वर्णन नहीं हो सकता, तुलसीदास कहते हैं कि मेरी बुद्धि छोटी है और उनकी मनोहरता बहुत बड़ी। सीता को आते देखकर सब बाराती मन ही मन प्रणाम करते हैं और श्रीराम को देखकर पूर्णकाम हो जाते हैं। पुत्रों सहित दशरथ के आनंद का पार नहीं। देवता फूल बरसाते हैं, मुनि आशीष देते हैं। सीता के मंडप में आने पर मुनि शांतिपाठ करते हैं और दोनों कुलगुरु सब आचार करते हैं। ब्राह्मण गौरी और गणपति का पूजन कराते हैं और देवता प्रकट होकर पूजा लेते हैं। सीता सिंहासन पर बैठाई जाती हैं। सीता और श्रीराम की परस्पर दृष्टि का प्रेम कोई नहीं देख पाता। होम के समय अग्नि देह धरकर आहुति लेते हैं और वेद ब्राह्मण बनकर विवाह विधि बताते हैं।
सिय सुन्दरता बरनि न जाई । लघु मति बहुत मनोहरताई ॥
आवत दीखि बरातिन्ह सीता । रूप-रासि सब भाँति पुनीता ॥
siya sundaratā barani na jāī | laghu mati bahuta manoharatāī ||
āvata dīkhi barātinha sītā | rūpa-rāsi saba bhām̐ti punītā ||
सबहि मनहिँ मन किये प्रनामा । देखि राम भये पूरनकामा ॥
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता । कहि न जाइ उर आनँद जेता ॥
sabahi manahim̐ mana kiye pranāmā | dekhi rāma bhaye pūranakāmā ||
haraṣe dasaratha sutanha sametā | kahi na jāi ura ānam̐da jetā ||
सुर प्रनाम करि बरसहिं फूला । मुनि-असीस-धुनि मङ्गल-मूला ॥
गान-निसान-कोलाहल भारी । प्रेम-प्रमोद-मगन नर-नारी ॥
sura pranāma kari barasahiṃ phūlā | muni-asīsa-dhuni maṅgala-mūlā ||
gāna-nisāna-kolāhala bhārī | prema-pramoda-magana nara-nārī ||
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई । प्रमुदित सान्ति पढ़हिँ मुनिराई ॥
तेहि अवसर कर विधि ब्यवहारू । दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू ॥
ehi bidhi sīya maṃḍapahiṃ āī | pramudita sānti par̤hahim̐ munirāī ||
tehi avasara kara vidhi byavahārū | duhum̐ kulagura saba kīnha acārū ||
आचार करि गुरु-गौरि-गनपति, मुदित विप्र पुजावहीं ।
सुर प्रगटि पूजा लेहिँ देहिँ, असीस अति सुख पावहीं ॥
मधुपर्क मङ्गल-द्रव्य जो जेहि, समय मुनि मन महँ चहैं ।
भरे कनक-कोपर-कलस सो, सब लिएहिं परिचारक रहैं ॥
ācāra kari guru-gauri-ganapati, mudita vipra pujāvahīṃ |
sura pragaṭi pūjā lehim̐ dehim̐, asīsa ati sukha pāvahīṃ ||
madhuparka maṅgala-dravya jo jehi, samaya muni mana maham̐ cahaiṃ |
bhare kanaka-kopara-kalasa so, saba liehiṃ paricāraka rahaiṃ ||
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि,-देत सब सादर किये ।
एहि भाँति-देव पुजाइ सीतहि, सुभग सिंघासनु दिये ॥
सिय-राम अवलोकनि परसपर, प्रेम काहु न लखि परै ।
मन-बुद्धि-बर-बानी अगोचर, प्रगट कबि कैसें करै ॥
kula rīti prīti sameta rabi kahi,-deta saba sādara kiye |
ehi bhām̐ti-deva pujāi sītahi, subhaga siṃghāsanu diye ||
siya-rāma avalokani parasapara, prema kāhu na lakhi parai |
mana-buddhi-bara-bānī agocara, pragaṭa kabi kaiseṃ karai ||
होम समय तनु धरि अनल, अति सुख आहुति लेहिँ ।
विप्र बेष धरि बेद सब, कहि बिबाह विधि देहिँ ॥
homa samaya tanu dhari anala, ati sukha āhuti lehim̐ |
vipra beṣa dhari beda saba, kahi bibāha vidhi dehim̐ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0