बारातियों ने अपने अपने डेरे देखे, जहाँ देवताओं के सब सुख सब प्रकार सुलभ थे। इस वैभव का भेद कोई नहीं जान सका, सब जनक की बड़ाई करते हैं। श्रीराम ने इसे सीताजी की महिमा जाना और कारण पहचानकर मन में हर्षित हुए। पिता का आगमन सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में आनन्द समाता नहीं, पर संकोच के कारण गुरु से कह नहीं सकते; मन में पिता के दर्शन की लालसा है। उनकी विनम्रता देखकर विश्वामित्र सन्तुष्ट हुए। उन्होंने हर्षित होकर दोनों भाइयों को हृदय से लगाया। वे उन्हें लेकर दशरथ के जनवासे को चले, मानो सरोवर स्वयं प्यासे की ओर चला हो। पुत्रों सहित मुनि को आते देख राजा हर्ष से उठे और सुख के समुद्र में मानो थाह लेते हुए आगे बढ़े।