बालकाण्ड

अध्याय 306: जनवासा और सीताजी की सिद्धियाँ

5 श्लोक · 306 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

जनवासा और सीताजी की सिद्धियाँ

देवांगनाएँ फूल बरसाकर गाती हैं और प्रसन्न देवता दुन्दुभियाँ बजाते हैं। अगवानों ने सब वस्तुएँ राजा दशरथ के आगे रख दीं और बड़े प्रेम से विनती की। राजा ने प्रेम से सब ले लिया और वह याचकों को बाँट दिया गया। पूजा, सम्मान और बड़ाई करके वे उन्हें जनवासे की ओर ले चले। मार्ग में ऐसे विचित्र वस्त्रों के पाँवड़े बिछे हैं जिन्हें देखकर कुबेर भी धन का घमण्ड छोड़ दे। बहुत सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबके लिए सब प्रकार की सुविधा थी। बारात को नगर में आई जानकर सीताजी ने अपनी कुछ महिमा प्रकट की। हृदय में स्मरण करके उन्होंने सब सिद्धियों को बुलाया और राजा की पहुनाई करने भेजा। सीताजी की आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ सारी सम्पदा, सुख और देवलोक के भोग विलास लेकर जनवासे में गईं।

306.1

बरषि सुमन सुर सुन्दरि गावहिँ । मुदित देव दुंदुभीं बजावहिँ ॥
बस्तु सकल राखीं नृप आगें । बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें ॥

baraṣi sumana sura sundari gāvahim̐ | mudita deva duṃdubhīṃ bajāvahim̐ ||
bastu sakala rākhīṃ nṛpa āgeṃ | binaya kīnha tinha ati anurāgeṃ ||

306.2

प्रेम समेत रायँ सब लीन्हा । भइ बकसीस जाचकन्हि दीन्हा ॥
करि पूजा मान्यता बड़ाई । जनवासे कह चले लवाई ॥

prema sameta rāyam̐ saba līnhā | bhai bakasīsa jācakanhi dīnhā ||
kari pūjā mānyatā bar̤āī | janavāse kaha cale lavāī ||

306.3

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं । देखि धनहु धन-मद परिहरहीं ॥
अति सुन्दर दीन्हेउ जनवासा । जहं सब कह सब भाँति सुपासा ॥

basana bicitra pām̐var̤e parahīṃ | dekhi dhanahu dhana-mada pariharahīṃ ||
ati sundara dīnheu janavāsā | jahaṃ saba kaha saba bhām̐ti supāsā ||

306.4

जानी सियँ बरात पुर आई । कछु निज महिमा प्रगटि जनाई ॥
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई । भूप पहुनई करन पठाई ॥

jānī siyam̐ barāta pura āī | kachu nija mahimā pragaṭi janāī ||
hṛdayam̐ sumiri saba siddhi bolāī | bhūpa pahunaī karana paṭhāī ||

दो॰ 306दोहा

सिधि सब सिय आयसु अकनि, गईं जहाँ जनवास ।
लिये सम्पदा सकल सुख, सुरपुर भोग बिलास ॥

sidhi saba siya āyasu akani, gaīṃ jahām̐ janavāsa |
liye sampadā sakala sukha, surapura bhoga bilāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0