देवांगनाएँ फूल बरसाकर गाती हैं और प्रसन्न देवता दुन्दुभियाँ बजाते हैं। अगवानों ने सब वस्तुएँ राजा दशरथ के आगे रख दीं और बड़े प्रेम से विनती की। राजा ने प्रेम से सब ले लिया और वह याचकों को बाँट दिया गया। पूजा, सम्मान और बड़ाई करके वे उन्हें जनवासे की ओर ले चले। मार्ग में ऐसे विचित्र वस्त्रों के पाँवड़े बिछे हैं जिन्हें देखकर कुबेर भी धन का घमण्ड छोड़ दे। बहुत सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबके लिए सब प्रकार की सुविधा थी। बारात को नगर में आई जानकर सीताजी ने अपनी कुछ महिमा प्रकट की। हृदय में स्मरण करके उन्होंने सब सिद्धियों को बुलाया और राजा की पहुनाई करने भेजा। सीताजी की आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ सारी सम्पदा, सुख और देवलोक के भोग विलास लेकर जनवासे में गईं।