बालकाण्ड

अध्याय 300: हाथी, पालकी और राम दर्शन की लालसा

5 श्लोक · 300 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

हाथी, पालकी और राम दर्शन की लालसा

श्रेष्ठ हाथियों पर सुन्दर अम्बारियाँ पड़ीं, जो इस प्रकार सजाई गईं कि कही नहीं जातीं। घण्टों से सुशोभित मतवाले हाथी चले, मानो सावन के बादलों की सुन्दर पाँत हो। और भी अनेक प्रकार की सवारियाँ, सुन्दर पालकियाँ और सुखासन हैं, जिन पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चले, मानो सब वेदों के छन्द ही शरीर धरकर चले हों। मागध, सूत, भाट और गुण गाने वाले, जो जिस योग्य थे वैसी सवारी पर चढ़कर चले। अनेक जातियों के खच्चर, ऊँट और बैल अनगिनत प्रकार की वस्तुएँ लादकर चले। करोड़ों कहार काँवरें लेकर चले; उनमें भरी वस्तुओं का वर्णन कौन करे। सब सेवक अपना अपना साज सजाकर चले। सबके हृदय हर्ष से भरे हैं और शरीर पुलकित हैं: कब हम राम और लक्ष्मण दोनों वीरों को आँख भरकर देखेंगे।

300.1

कलित करिवरन्हि परीं अँबारीं । कहि न जाइ जेहि भाँति सँवारीं ॥
चले मत्तगज घंट बिराजी । मनहुँ सुभग सावन-घन-राजी ॥

kalita karivaranhi parīṃ am̐bārīṃ | kahi na jāi jehi bhām̐ti sam̐vārīṃ ||
cale mattagaja ghaṃṭa birājī | manahum̐ subhaga sāvana-ghana-rājī ||

300.2

बाहन अपर अनेक विधाना । सिबिका सुभग सुखासन जाना ॥
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा । जनु तनु धरें सकल-श्रुति-छन्दा ॥

bāhana apara aneka vidhānā | sibikā subhaga sukhāsana jānā ||
tinha car̤hi cale biprabara bṛndā | janu tanu dhareṃ sakala-śruti-chandā ||

300.3

मागध सूत बन्दि गुन गायक । चले जान चढ़ि जो जेहि लायक ॥
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती । चले बस्तु भरि अगनित भाँती ॥

māgadha sūta bandi guna gāyaka | cale jāna car̤hi jo jehi lāyaka ||
besara ūm̐ṭa bṛṣabha bahu jātī | cale bastu bhari aganita bhām̐tī ||

300.4

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा । बिबिध बस्तु को बरनइ पारा ॥
चले सकल सेवक-समुदाई । निज निज साज समाज बनाई ॥

koṭinha kām̐vari cale kahārā | bibidha bastu ko baranai pārā ||
cale sakala sevaka-samudāī | nija nija sāja samāja banāī ||

दो॰ 300दोहा

सब कें उर निर्भर हरष, पूरित पुलक सरीर ।
कबहिं देखिबे नयन भरि, राम लखनू दोउ बीर ॥

saba keṃ ura nirbhara haraṣa, pūrita pulaka sarīra |
kabahiṃ dekhibe nayana bhari, rāma lakhanū dou bīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0