बालकाण्ड

अध्याय 301: सुमन्त्र दो रथ लाते हैं

5 श्लोक · 301 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सुमन्त्र दो रथ लाते हैं

हाथी गरजते हैं, घण्टों की घोर ध्वनि है, चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ों की हिनहिनाहट है। नगाड़े बादलों का भी निरादर करके गरजते हैं, अपनी पराई कोई बात कान में सुनाई नहीं देती। अटारियों पर चढ़ी स्त्रियाँ मंगल थालों में आरती लिए देख रही हैं और मनोहर गीत गा रही हैं। तब सुमन्त्र ने दो रथ सजाकर उनमें सूर्य के घोड़ों को लजाने वाले घोड़े जोते और राजा के पास ले आए; उनका वर्णन शारदा भी नहीं कर सकतीं। एक रथ राजसी साज से सजा है, दूसरा तेज से जगमगाता है। उस सुन्दर रथ पर राजा ने हर्षित होकर वसिष्ठ को चढ़ाया और फिर हर, गुरु, गौरी और गणेश का स्मरण करके स्वयं अपने रथ पर चढ़े।

301.1

गरजहिँ गज घंटा धुनि घोरा । रथ-रव बाजि हिंस चहुँ ओरा ॥
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना । निज पराइ कछु सुनिय न काना ॥

garajahim̐ gaja ghaṃṭā dhuni ghorā | ratha-rava bāji hiṃsa cahum̐ orā ||
nidari ghanahi ghurmmarahiṃ nisānā | nija parāi kachu suniya na kānā ||

301.2

महा भीर भूपति के द्वारें । रज होइ जाइ पषान पबारें ॥
चढ़ी अटारिन्ह देखहिँ नारीं । लिये आरती मङ्गल थारी ॥

mahā bhīra bhūpati ke dvāreṃ | raja hoi jāi paṣāna pabāreṃ ||
car̤hī aṭārinha dekhahim̐ nārīṃ | liye āratī maṅgala thārī ||

301.3

गावहिँ गीत मनोहर नाना । अति आनन्द न जाइ बखाना ॥
तब सुमन्त्र दुइ स्यन्दन साजी । जोते रबि-हय-निन्दक बाजी ॥

gāvahim̐ gīta manohara nānā | ati ānanda na jāi bakhānā ||
taba sumantra dui syandana sājī | jote rabi-haya-nindaka bājī ||

301.4

दोउ रथ रुचिर भूप पहिँ आने । नहिँ सारद पहिँ जाहिँ बखाने ॥
राज-समाज एक रथ साजा । दूसर तेज-पुञ्ज अति भ्राजा ॥

dou ratha rucira bhūpa pahim̐ āne | nahim̐ sārada pahim̐ jāhim̐ bakhāne ||
rāja-samāja eka ratha sājā | dūsara teja-puñja ati bhrājā ||

दो॰ 301दोहा

तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कह, हरषि चढ़ाइ नरेस ।
आपु चढ़ेउ स्यन्दन सुमिरि, हर गुरु गौरि गनेस ॥

tehiṃ ratha rucira basiṣṭha kaha, haraṣi car̤hāi naresa |
āpu car̤heu syandana sumiri, hara guru gauri ganesa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0