पहुँचे दूत राम-पुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥
भूप-द्वार तिन्ह खबरि जनाई । दसरथ नृप सुनि लिये बोलाई ॥
pahum̐ce dūta rāma-pura pāvana | haraṣe nagara biloki suhāvana ||
bhūpa-dvāra tinha khabari janāī | dasaratha nṛpa suni liye bolāī ||
5 श्लोक · 290 में से 361
दूत श्रीराम की पावन पुरी पहुँचे और सुन्दर नगर देखकर हर्षित हुए। उन्होंने राजद्वार पर सूचना दी; राजा दशरथ ने सुनकर उन्हें बुला लिया। प्रणाम करके उन्होंने पत्र दिया, प्रसन्न राजा ने उठकर स्वयं लिया। पत्र पढ़ते समय आँखों में जल भर आया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आई। हृदय में राम लक्ष्मण और हाथ में चिट्ठी, राजा कुछ खट्टा मीठा कह न सके। फिर धीरज धरकर पत्रिका पढ़ी और सच्ची बात सुनकर सभा हर्षित हुई। भरत अपने मित्रों और भाई के साथ वहीं खेल रहे थे; समाचार पाकर आए और प्रेम से सकुचाते हुए पूछा: पिताजी, पाती कहाँ से आई है? प्राणप्रिय दोनों भाई कुशल से हैं, किस देश में हैं? स्नेह से सने ये वचन सुनकर राजा ने फिर से पत्र पढ़ा।
पहुँचे दूत राम-पुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥
भूप-द्वार तिन्ह खबरि जनाई । दसरथ नृप सुनि लिये बोलाई ॥
pahum̐ce dūta rāma-pura pāvana | haraṣe nagara biloki suhāvana ||
bhūpa-dvāra tinha khabari janāī | dasaratha nṛpa suni liye bolāī ||
करि प्रनाम तिन्ह पाती दीन्ही । मुदित महीप आप उठि लीन्ही ॥
बारि-बिलोचन बाचत पाती । पुलक गात आई भरि छाती ॥
kari pranāma tinha pātī dīnhī | mudita mahīpa āpa uṭhi līnhī ||
bāri-bilocana bācata pātī | pulaka gāta āī bhari chātī ||
राम-लखन-उर कर-नर-चीठी । रहि गये कहत न खाटी मीठी ॥
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची । हरषी सभा बात सुनि साँची ॥
rāma-lakhana-ura kara-nara-cīṭhī | rahi gaye kahata na khāṭī mīṭhī ||
puni dhari dhīra patrikā bām̐cī | haraṣī sabhā bāta suni sām̐cī ||
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई । आये भरत सहित हित भाई ॥
पूछत अति सनेहँ सकुचाई । तात कहाँ से पाती आई ॥
khelata rahe tahām̐ sudhi pāī | āye bharata sahita hita bhāī ||
pūchata ati saneham̐ sakucāī | tāta kahām̐ se pātī āī ||
कुसल प्रान प्रिय बन्धु दोउ, अहहिँ कहहु केहिं देस ।
सुनि सनेह-साने-बचन, बाची बहुरि नरेस ॥
kusala prāna priya bandhu dou, ahahim̐ kahahu kehiṃ desa |
suni saneha-sāne-bacana, bācī bahuri naresa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0