रचे रुचिर बर बंदनिबारे । मनहुँ मनोभवँ फन्द सँवारे ॥
मङ्गल-कलस अनेक बनाये । ध्वज पताक पर चमर सुहाये ॥
race rucira bara baṃdanibāre | manahum̐ manobhavam̐ phanda sam̐vāre ||
maṅgala-kalasa aneka banāye | dhvaja patāka para camara suhāye ||
5 श्लोक · 289 में से 361
सुन्दर बन्दनवार बाँधे गए, मानो कामदेव ने फन्दे सजाए हों। अनेक मंगल कलश बनाए गए, ध्वजा, पताका, परदे और चँवर सुशोभित हैं। मणियों के अनेक मनोहर दीपक हैं; मण्डप की विचित्रता का वर्णन नहीं हो सकता। जिस मण्डप में वैदेही दुलहिन हैं और रूप तथा गुणों के सागर श्रीराम दूल्हा, उसका वर्णन करने योग्य बुद्धि किसकी है? वह मण्डप तीनों लोकों में प्रकाशित है। जनक के भवन की जैसी शोभा है, वैसी ही नगर के घर घर में दिखती है। जिसने उस समय तिरहुत को देखा, उसे चौदहों भुवन छोटे लगे। वहाँ छोटे घर में जो सम्पदा थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता। जिस नगर में लक्ष्मी कपट से सुन्दर स्त्री का वेष धरकर बसती हैं, उसकी शोभा कहने में शारदा और शेष भी सकुचाते हैं।
रचे रुचिर बर बंदनिबारे । मनहुँ मनोभवँ फन्द सँवारे ॥
मङ्गल-कलस अनेक बनाये । ध्वज पताक पर चमर सुहाये ॥
race rucira bara baṃdanibāre | manahum̐ manobhavam̐ phanda sam̐vāre ||
maṅgala-kalasa aneka banāye | dhvaja patāka para camara suhāye ||
दीप मनोहर मनि-मय नाना । जाइ न बरनि विचित्र बिताना ॥
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही । सो बरनइ असि मति कबि केहि ॥
dīpa manohara mani-maya nānā | jāi na barani vicitra bitānā ||
jehiṃ maṃḍapa dulahini baidehī | so baranai asi mati kabi kehi ||
दूलह राम रूप-गुन-सागर । सो वितान तिहुँ लोक उजागर ॥
जनक-भवन कै सौभा जैसी । गृह गृह प्रति पुर देखिय तैसी ॥
dūlaha rāma rūpa-guna-sāgara | so vitāna tihum̐ loka ujāgara ||
janaka-bhavana kai saubhā jaisī | gṛha gṛha prati pura dekhiya taisī ||
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी । तेहि लघु लगहिं भुवन दस-चारी ॥
जो सम्पदा नीच गृह सोहा । सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥
jehiṃ terahuti tehi samaya nihārī | tehi laghu lagahiṃ bhuvana dasa-cārī ||
jo sampadā nīca gṛha sohā | so biloki suranāyaka mohā ||
बसइ नगर जेहि लच्छ करि, कपट नारि बर बेष ।
तेहि पुर के सोभा कहत, सकुचहिं सारद सेष ॥
basai nagara jehi laccha kari, kapaṭa nāri bara beṣa |
tehi pura ke sobhā kahata, sakucahiṃ sārada seṣa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0