भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मङ्गल दिसि दसहूँ ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥
bhāyam̐ kubhāyam̐ anakha ālasahūm̐ | nāma japata maṅgala disi dasahūm̐ ||
sumiri so nāma rāma guna gāthā | karaum̐ nāi raghunāthahi māthā ||
8 श्लोक · 28 में से 361
प्रेम से या बिना प्रेम, क्रोध या आलस्य से भी नाम जपने पर दसों दिशाओं में मंगल होता है। उसी नाम का स्मरण करके तुलसीदास रघुनाथ को सिर नवाकर कथा आरम्भ करते हैं। उन्हें भरोसा है कि जिनकी कृपा कभी नहीं थकती, वे प्रभु सब सुधार देंगे। राम अच्छे स्वामी हैं और तुलसी बुरा सेवक, फिर भी दयानिधि अपना स्वभाव देखकर उसका पालन करते हैं। धनी और गरीब, पण्डित और मूर्ख सब राजा की सराहना करते हैं, और ईश्वर के अंश से जन्मा राजा सबकी भक्ति पहचानकर सम्मान करता है। साधारण राजा ऐसा है, तो ज्ञानियों के शिरोमणि राम शुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं। दोहे कहते हैं कि पत्थरों को तैराने वाले, भालुओं को मन्त्री बनाने वाले सीतानाथ तुलसीदास के स्वामी हैं।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मङ्गल दिसि दसहूँ ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥
bhāyam̐ kubhāyam̐ anakha ālasahūm̐ | nāma japata maṅgala disi dasahūm̐ ||
sumiri so nāma rāma guna gāthā | karaum̐ nāi raghunāthahi māthā ||
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिँ कृपाँ अघाती ॥
राम सुस्वामि कुसेवक मो सो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ॥
mori sudhārihi so saba bhām̐tī | jāsu kṛpā nahim̐ kṛpām̐ aghātī ||
rāma susvāmi kusevaka mo so | nija disi dekhi dayānidhi poso ||
लोकहु बेद सुसाहिब रीतीं । बिनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर । पंडित मूढ़ मलीन उजागर ॥
lokahu beda susāhiba rītīṃ | binaya sunata pahicānata prītī ||
ganī garība grāma nara nāgara | paṃḍita mūr̤ha malīna ujāgara ||
सुकबि कुकबि निज-मति-अनुहारी । नृपहि सराहत सब नर नारी ॥
साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस-अंस-भव परम कृपाला ॥
sukabi kukabi nija-mati-anuhārī | nṛpahi sarāhata saba nara nārī ||
sādhu sujāna susīla nṛpālā | īsa-aṃsa-bhava parama kṛpālā ||
सुनि सनमानहिँ सबहि सुबानी । भनिति भगति नति गति पहिचानी ॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ । जान-सिरोमनि कोसलराऊ ॥
suni sanamānahim̐ sabahi subānī | bhaniti bhagati nati gati pahicānī ||
yaha prākṛta mahipāla subhāū | jāna-siromani kosalarāū ||
रीझत राम सनेह निसोतें । को जग मन्द मलिन-मन मो ते ॥
rījhata rāma saneha nisoteṃ | ko jaga manda malina-mana mo te ||
सठ सेवक की प्रीति रुचि, रखिहहिँ राम कृपालु ।
उपल किये जलजान जेहिं, सचिव सुमति कपि भालु ॥
saṭha sevaka kī prīti ruci, rakhihahim̐ rāma kṛpālu |
upala kiye jalajāna jehiṃ, saciva sumati kapi bhālu ||
हौहु कहावत सब कहत, राम सहत उपहास ।
साहिब सीतानाथ से, सेवक तुलसीदास ॥
hauhu kahāvata saba kahata, rāma sahata upahāsa |
sāhiba sītānātha se, sevaka tulasīdāsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0